निवेश करने से पहले निवेश का लक्ष्य तय करना भी एक महत्वपूर्ण कदम है। कोई लक्ष्य जो एक व्यक्ति के लिए बेहतर है, जरूरी नहीं वह लक्ष्य पाकर दूसरे व्यक्ति की जरूरत भी पूरी हो जाए। हर व्यक्ति को अपनी जरूरत के हिसाब से अपने लिए लक्ष्य तय करना चाहिए। उसी लक्ष्य के हिसाब से कदम आगे बढ़ाना चाहिए। निवेश की सफलता तभी है, जब आपको वह लक्ष्य मिल जाए, जिसकी आपको जरूरत है।

एक क्रिकेटर मैदान पर खेलने पहुंचा। 28 रन बनाते हुए उसने हेलमेट उतारा और हवा में बल्ला लहराकर दर्शकों का अभिवादन करने लगा। ऐसा लगा जैसे उसने शतक लगा दिया हो। लेकिन ऐसा हुआ तो नहीं था। फिर उसने यह किया क्यों? उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसका बैटिंग एवरेज उस समय 27.6 पर पहुंच गया था और उसने मैदान पर उतरने से पहले यही लक्ष्य रखा था। इस एवरेज पर पहुंचते ही उसे लगा कि वह लक्ष्य हासिल करने में सफल रहा।

यह केवल क्रिकेट की बात नहीं: यह एक चुटकुला था। लेकिन सच कहें तो यह केवल क्रिकेट से जुड़ा चुटकुला नहीं है। यह निवेशकों से भी जुड़ा है। असल जिंदगी में कोई क्रिकेटर ऐसा नहीं करेगा लेकिन ढेरों निवेश प्रबंधक हैं जो कुछ ऐसा ही करते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने सामान्य पैरामीटर को पार कर लिया तो उनसे जुड़े ग्राहकों की उम्मीद भी पूरी हो जाती है।

यह सोच नीचे निवेशकों तक भी पहुंच जाती है। एक बचतकर्ता के रूप में किसी व्यक्ति को क्या चाहिए? क्या उसका लक्ष्य किसी इंडेक्स या एवरेज को पीछे छोड़ने का रहता है? बहुत से निवेशक किसी इंडेक्स या एवरेज को पछाड़ने को ही उपलब्धि मानने लगते हैं। अगर निवेश फिक्स्ड इनकम के हिसाब से की गई हो तो उन्हें लगता है कि एफडी में मिलने वाले ब्याज से ज्यादा ब्याज मिलना पर्याप्त है। मामला अगर इक्विटी का हो तो निफ्टी या सेंसेक्स के रिटर्न को पछाड़ना ही उनका लक्ष्य रहता है।

इस सोच को मीडिया और कई विश्लेषकों की ओर से भी समर्थन मिलता है। अभी साल खत्म हो रहा है। जल्द ही अखबार, पत्रिकाएं और वेबसाइट विभिन्न लेख, टेबल और ग्राफों से भर जाएंगे। इन सबमें यही लिखा होगा कि 2017 में किसका प्रदर्शन अच्छा रहा। आपको 2017 के टॉप स्टॉक, टॉप फंड, टॉप सेक्टर जैसी तमाम बातों की जानकारी दी जाएगी। ये सब आंकड़े किसी ऐसे निवेशक के लिए बहुत फायदेमंद हैं, जो पहली जनवरी को पैसा निवेश करता हो और 31 दिसंबर को निकाल लेता हो। दूसरे शब्दों में कहें तो ये सब आंकड़े किसी के काम के नहीं होते।

कोई व्यक्ति जो ऐसे किसी बेंचमार्क को ध्यान में रखकर निवेश करता है, वह निश्चित रूप से बेहतर परिणाम नहीं पा सकता। हो सकता है कि कोई सभी एवरेज बेंचमार्क से आगे निकलने के बाद भी हार जाए। बिलकुल उसी क्रिकेटर की तरह, जिसका लेख की शुरुआत में जिक्र किया गया है।

दौड़ है किस बात की: सवाल है कि निवेशकों को कौन सा बेंचमार्क मानकर चलना चाहिए? बेंचमार्क तय करने का आधार क्या होना चाहिए? इसका सीधा सा उत्तर है कि बेंचमार्क आपकी जरूरत के हिसाब से तय होना चाहिए। आपकी जरूरत ही इस बात को तय करती है कि आप किस तरह निवेश करेंगे और अपने निवेश से क्या उम्मीद रखेंगे। हम सबके पास कुछ ऐसी धनराशि होती है, जिसे हर महीने निवेश किया जा सकता है। रिटर्न और सुरक्षा के लिहाज से भी नियमित रूप से महीने दर महीने निवेश करना अच्छा रहता है। मासिक एसआइपी इक्विटी फंड के नतीजे आमतौर पर अन्य से बेहतर मिलते हैं।

स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि बेंचमार्क हर व्यक्ति की जरूरत के हिसाब से अलग-अलग होता है। निवेश को लेकर आम धारणा ढेरों निवेश के नतीजों के आधार पर बनाई जाती है। लेकिन इसके आधार पर अपना व्यक्तिगत लक्ष्य तय नहीं किया जा सकता है। व्यक्तिगत लक्ष्य तो अपनी जरूरतों पर ही आधारित होना चाहिए। जैसे आपको भविष्य में कितने पैसों की जरूरत होगी? क्या आपके निवेश लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं? क्या आपने पहले निवेश का लक्ष्य हासिल किया था? ये सवाल और इनके जवाब ही निवेश से जुड़े फैसले लेने से पहले मायने रखते हैं। अगर इनके जवाब नहीं में हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपको एफडी या सेंसेक्स से ज्यादा रिटर्न मिल गया। यह आपकी दौड़ थी ही नहीं।

आमतौर पर ज्यादातर मामलों में कोई जितने समय तक गतिशील बना रहता है, लक्ष्य हासिल करने की संभावनाएं उतनी ही बढ़ती जाती हैं। बचत या निवेश के मामले में ऐसा नहीं होता। यह प्रक्रिया जटिल है। पहले यह जानना कि भविष्य में कितने पैसे की जरूरत होगी। फिर उसके हिसाब से निवेश करना। उसके बाद यह ध्यान रखना कि निवेश उस दिशा में जा रहा है या नहीं। इस पूरी प्रक्रिया का कोई आसान विकल्प नहीं है।

(यह लेख वैल्यू रिसर्च के सीईओ धीरेन्द्र कुमार ने लिखा है।)

By Praveen Dwivedi