नई दिल्ली (धीरेंद्र कुमार)। विमुद्रीकरण सफल होगा या विफल? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि सफलता और विफलता की आपकी परिभाषा क्या है। एक मानक यह है कि अगर आर्थिक गतिविधियां काले धन से हटकर सफेद धन में होने लगेंगी तो विमुद्रीकरण सफल माना जाएगा। इसके अलावा कई और मानक हैं जो चर्चा में हैं। एक विचार यह है कि विमुद्रीकरण को तभी सफल माना जाएगा जब जनता के हाथ में मौजूद करेंसी का एक बड़ा भाग गायब हो जाए। इसका मतलब यह है कि जिस व्यक्ति के पास भी कालाधन है वह इसे बैंक में जमा न करके अपने पास ही रखकर दफन कर दे।

कोई भी व्यक्ति अभी यह विकल्प क्यों चुनेगा स्पष्ट नहीं है क्योंकि उसको प्रभावी रूप से 35 प्रतिशत धनराशि वापस मिल जाएगी। (इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि 25 प्रतिशत राशि को चार साल की अवधि के लिए बिना किसी ब्याज के रखा जाएगा।) वास्तव में यह एक तरह की जबरन माफी योजना है क्योंकि इसके तहत अगर कोई धनराशि जमा नहीं की जाती है तो वह खत्म हो जाएगी। दूसरा विचार यह है कि कोई भी विमुद्रीकरण की प्रक्रिया तभी सफल मानी जाएगी जब अर्थव्यवस्था में मौजूद पूरी नकदी बदल दी जाए। यह भी पूरी तरह भ्रमित करने वाला विचार है। पूरी तरह नकदी बदलने के बजाय मैं तो यही कहूंगा कि विमुद्रीकरण का एक लक्ष्य देश को लेसकैश सोसाइटी बनाना है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है जो भी कैश हो वह रुपये के छोटे नोट में हो। इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था में अब पहले की अपेक्षा कम कैश होगा।

वास्तव में कोई भी व्यक्ति यह नहीं जानता कि कितनी कम नकदी में अर्थव्यवस्था चल सकेगी इसलिए यह डायनमिक तरीके से तय होगा। इसके साथ ही जब नकदी की समस्या खत्म होने लगेगी, सरकार को सिस्टम में 500 रुपये और 2000 रुपये के नोट डालना बंद कर देना चाहिए। इसके बाद सिस्टम में सिर्फ 100 रुपये के नोट भरने चाहिए। असल में लेनदेन जब 100 रुपये के नोट में होगा तो कैश से लेनदेन काफी कठिन होगा। फिलहाल विमुद्रीकरण की सफलता दो घटनाओं के रूप में दिख रही है। पहली घटना है देशभर में बड़ी मात्रा में नकदी का पकड़ा जाना। रोचक बात यह है कि इस घटनाक्रम ने उन अफवाहों को जन्म दिया कि नए नोट की स्याही में एक आइसोटोप है जैसा कि मिशन इंपोसिबल फिल्म में दिखाया गया है।

सत्यता कुछ भी हो लेकिन यह उन लोगों के लिए एक समस्या बनी हुई है जो बड़ी मात्रा में नई करेंसी जमा करना चाहते हैं। इस कवायद का सबसे अच्छा पहलू (या यह आपके नजरिये पर निर्भर करेगा) यह है कि 30 दिसंबर तक अर्थव्यवस्था में उपलब्ध नकदी बैंकिंग तंत्र से होकर गुजर जाएगी। सहकारी बैंक इस कवायद से बाहर रखे गए हैं। इस तरह 30 दिसंबर तक 15 लाख करोड़ रुपये नकदी के बारे में सूचनाएं बैंकिंग तंत्र के पास आ जाएंगी।

इस तरह यह बिग डेटा होगा और जो भी लोग इसके प्रभाव को समझते हैं वे जानते हैं कि यह काले धन के खिलाफ जंग में वास्तव में एक ब्रह्मास्त्र होगा। आप अपने बंद पड़े बैंक खाते को कोई संदिग्ध गतिविधि करने के लिए बैंक मैनेजर के माध्यम से दुरुपयोग करने को दे सकते हैं। आपको इसके लिए कुछ मिल भी सकता है। लेकिन ये सभी गतिविधियां पकड़ी जा सकती हैं। इसकी पकड़-धकड़ शुरू हो गई है और आने वाले दिनों में यह और जोर पकड़ेगी। ऐसे में जब कैश सिस्टम में होकर निकला है तो इसे छुपाना बेहद मुश्किल होगा। दूसरा प्रभाव यह होगा कि खुदरा व्यापारिक गतिविधियां मजबूरन कैशलेस ट्रांजैक्शन में शिफ्ट हो जाएंगी। यह शिफ्ट एकतरफा होगा। यह भी अपने पीछे डाटा ट्रेल छोड़ेगा। जो भी व्यक्ति इस विचार में कैद नहीं है कि विमुद्रीकरण फेल हो गया और वास्तविक कारोबारियों के साथ बातचीत कर रहा है वह भलीभांति जानता है कि किस तरह ब्लैक अर्थव्यवस्था तेजी से वाइट में शिफ्ट हो रही है।

यह लेख वैल्यु रिसर्च ऑनलाइन के संस्थापक और चीफ एग्जेक्यूटिव धीरेंद्र कुमार ने लिखा है।

Posted By: Surbhi Jain

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