अश्विनी कुमार, नई दिल्‍ली। मुंबई बजट 2020 से यह प्रतीत होता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था वास्तव में आर्थिक सुस्ती के दौर में है। अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करते हुए उसे मजबूत बनाने के लिए इसमें व्यापक पैमाने पर सार्वजनिक निवेश करने की आवश्यकता है, ताकि इससे अर्थव्यवस्था में रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकें और लोगों की क्रयक्षमता को बढ़ाया जा सके। ग्रामीण विकास मंत्रालय को आवंटित किए जाने वाले 1,22,000 करोड़ रुपयों (जिसमें मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट के तहत एक बड़ी रकम 61,500 करोड़ भी शामिल है) के माध्यम से मोदी सरकार ने जो संकेत दिया है वह बताता है कि दक्षिणपंथ अर्थव्यवस्था का मॉडल 'मार्केट फंडामेंटलिज्म' से 'केनेसियन मल्टीप्लायर' की ओर जा रहा है। 

दरअसल केनेसियन मल्टीप्लायर का सिद्धांत अर्थशास्त्र का वह सिद्धांत है जिसके तहत निजी उपभोग के लिए खर्च पर ज्यादा जोर दिया जाता है। इसमें सरकार अपनी ओर से खर्च कुछ इस तरह से करती है ताकि लोगों को अधिक से अधिक रोजगार मिल सके और समाज में खुशहाली आ सके।

हालांकि, इसमें खर्च के प्रारूप पर अधिक जोर नहीं दिया जाता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अर्थव्यवस्था को एक धर्मनिरपेक्ष देवी की भांति समझा जाता रहा है, क्योंकि मनरेगा, जिसके बारे में कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वे इसे 'यूपीए सरकार की नाकामियों की जिंदा धरोहर' के तौर पर जारी रखेंगे, आज वह केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार का प्रतीक बन चुका है। 

ग्रामीण भारत की खुशहाली के मकसद से समाज कल्याण योजनाओं पर भी सरकार ने पूरा ध्यान दिया है। वर्ष 2020 के बजट में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं के कल्याण के लिए किया गया 53,700 करोड़ रुपये का प्राविधान और अनुसूचित जाति एवं अन्य पिछड़ा वर्गो के लिए किया गया 85,000 करोड़ रुपये का प्राविधान तथा महिलाओं के उत्थान से जुड़े खास कार्यक्रमों के लिए किया गया 28,600 करोड़ रुपये का प्राविधान व सुपोषण योजनाओं के लिए किया गया 35,600 रुपये का प्राविधान, यह दर्शाता है कि देशवासियों के भूखे पेट को भरने में सक्षम होगा। 

ग्रामीण विकास मंत्रालय की योजनाओं के अलावा मोदी सरकार ने स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम का जो प्रावधान किया है वह भी गरीबों के हित में एक बड़ा कदम है। इसे भी दक्षिणपंथी कल्याण अर्थशास्त्र का हिस्सा कहा जा सकता है। सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए लिए वर्ष 2019-20 के बजट में 62,500 करोड़ रुपये देने प्राविधान किया था, जो उसके पिछले दो वित्तीय वर्षो में उच्चतम रही थी, उसे बढ़ाकर इस बार 69,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। 

जो लोग इस बजट को चुनावी नजरिये से देखना चाहेंगे, उन्हें इस बात से हैरानी नहीं होनी चाहिए कि गरीब घरों तक एलपीजी गैस पहुंचाने वाली सरकार की लोकप्रिय 'उज्ज्वला' योजना के लिए 1,118 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सामाजिक और ग्रामीण हित में खासकर उज्ज्वला योजना को परिवर्तनकारी योजना के रूप में देखा गया, और यह माना गया था कि मोदी सरकार को वर्ष 2019 के चुनावों में दोबारा से जीत दिलाने में इस योजना का व्यापक योगदान रहा है।

(लेखक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर हैं। प्रकाशित विचार उनके निजी हैं।) 

Posted By: Manish Mishra

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