नई दिल्ली, धीरेंद्र कुमार। दुनिया की सबसे धनी कंपनी बर्कशायर हैथवे के संस्थापक-चेयरमैन वारेन बफेट और वाइस चेयरमैन चार्ली मंगर की डायरीज बिल्कुल खाली हैं। दुनिया के और उन्हीं लोगों की तरह, जिनकी डायरीज में कुछ खास नहीं लिखा हुआ है। वाल स्ट्रीट जर्नल को दिए एक इंटरव्यू में 96 वर्षीय मंगर ने हाल ही में कहा कि बर्कशायर हैथवे वर्तमान में किसी भी निवेश के बारे में नहीं सोच रही है। दिलचस्प यह है कि बर्कशायर हैथवे के पास लगभग 12,500 करोड़ डॉलर यानी 10 लाख करोड़ रुपये के आसपास की नकदी है। इतनी नकदी इस वक्त दुनिया की किसी कंपनी के पास नहीं है। ऊपर से, अभी दुनियाभर के जो हालात हैं, उसमें हर तरह की संपत्ति बेहद सस्ते भाव में उपलब्ध है। मंगर दो-टूक कहते हैं कि इस वक्त जो वैश्विक हालात हैं, वो उनकी समझ से बाहर हैं। बल्कि किसी की भी समझ से बाहर हैं। इसलिए इस वक्त कहीं भी निवेश कर देने और बाद में पछताने से बेहतर यह है कि अभी नकदी को कस कर पकड़े रहो और समय को निकल जाने दो। 

मंगर कहते हैं, ''अभी जो दिख रहा है वह वाकई कुछ अलग है। हर कोई ऐसे बात कर रहा है जैसे वह भविष्य के बारे में सबकुछ जानता हो। लेकिन हकीकत यह है कि कोई नहीं जानता कि क्या होने वाला है। चार्ली मंगर के मुताबिक यह ऐसा समय है जब आपके पास करने को सिर्फ एक काम है, दूसरा कोई काम नहीं। वह यह कि आप जहां हैं, बिल्कुल वहीं रहें। सबसे अच्छा उपाय यही है कि इस वक्त कोई उपाय ही नहीं करें। अभी तो बस एक ही चीज पूछी जा सकती है कि क्या आपके पास ऐसा कोई सुबूत है कि आप जो कुछ भी करना चाहते हैं, उससे मौजूदा परिस्थितियों में कोई बदलाव आएगा या कि वह और बेहतर होगा?''

उनका कहना है कि अगर आपके पास ऐसा कोई सुबूत नहीं, तो आपका कुछ भी करना ठीक नहीं। लेकिन इसकी संभावना कम है कि लोग मौजूदा स्थितियों के मुकाबले किसी बेहतर स्थिति का इंतजार करते दिखेंगे। अभी तो ज्यादा संभावना इसी बात की दिख रही है कि लोग जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देंगे। स्वाभाविक है कि बहुत से लोगों ने मौजूदा परिस्थितियों का लाभ उठाकर आनन-फानन में कुछ न कुछ अतिरिक्त कमाई की जुगत तलाशी होगी, या तलाश रहे होंगे। अगर आप भी उनमें से एक हैं जो मौजूदा परिस्थितियों का लाभ उठाकर कुछ कमाने के बारे में सोच रहे हैं, तो मैं यही कहूंगा कि अपने लालच के घोड़े को लगाम दीजिए और बफेट व मंगर की राह पर चलिए। इस वक्त लंबी अवधि की तो छोड़ ही दीजिए, मध्यम व निकट अवधि के लिए भी ठोक-बजाकर कुछ कहना मुश्किल है। इसलिए ऐसी कोई कोशिश भी मत कीजिए। जैसा कि ये दोनों बुजुर्ग मानते हैं कि ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिन्हें पता कुछ भी नहीं, लेकिन वे ऐसा मोलते हें मानो उन्हें सब पता हो। उनकी मत सुनिए, वे बस बातें हैं। 

इस वक्त अगर कोई एक न्यायसंगत बस एक काम दिख रहा है, तो वह यह है कि वित्तीय या पारिवारिक कारणों से या फिर मानसिक शांति के लिए आप अपनी पूरी संपत्ति बैंक में डिपॉजिट या किसी अन्य रूप में रख दें। हालांकि इसका वित्तीय रूप से बहुत ज्यादा फायदा नहीं दिखेगा, लेकिन इससे मानसिक शांति खूब मिलेगी। वैसे, इस तरह का बदलाव सकारात्मक दिशा में नहीं ले जाएगा। इसका मकसद जोखिम को बिल्कुल खत्म कर देना है। मंगर असल में यह कह रहे हैं कि लाभ कमाने की लालच में मौजूदा परिस्थितियों का उपयोग करने के बारे में मत सोचिए। इस तरह की कोशिश की सलाह किसी के लिए नहीं है : ना आपके लिए, ना मेरे लिए और ना मंगर या बफेट के लिए।

डेट म्यूचुअल फंड्स में पिछले दिनों लिक्विडिटी का जिस तरह का संकट नजर आया है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में छोटे-बड़े कई व्यक्तिगत संकट सामने आने वाले हैं। इनमें से कुछ तो सिर्फ इसलिए होंगे क्योंकि बहुत से कारोबार पहले से ही दबाव में थे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो डेट फंड्स खुद हैं, जिनमें संकटग्रस्त संपत्तियों की चिंता में एक वर्ष से अधिक समय से कोई न कोई बाधा सामने आती ही रही थी। यह तय है कि पिछले दिनों जितने डेट फंड्स दबाव में दिखे हैं, उनका असेट अंडर मैनेजमेंट यानी एयूएम मात्रा के लिहाज से बहुत कम है। और बैंकिंग तंत्र के एनपीए के लिहाज से तो निश्चित तौर पर बेहद कम है।

इसका मतलब यह भी है कि म्यूचुअल फंड्स का तंत्र कम से कम इतना विकसित तो है कि इसकी समस्याएं तुरंत निवेशकों को हस्तांतरित हो जाती हैं। छोटी अवधि के लिए यह भले ही अच्छा नहीं हो, लेकिन लंबी अवधि के लिहाज से तंत्र बहुंत मजबूत है। यह बैंकों की तरह समस्याओं को लंबी अवधि तक दबाए नहीं रख पाता है। लेकिन इसका मतलब यह भी है कि वर्तमान माहौल बेहद संवेदनशील है और सरकार व आरबीआइ को बेहद संवेदनशीलता के साथ देश के वित्तीय तंत्र को इस चुनौतीपूर्ण दौर से निकालना होगा।जैसा कि इंटरव्यू में मंगर कहते हैं, 'मैं यह कहूंगा कि हम उस जहाज के कप्तान की तरह हैं जिसके सामने अब तक का सबसे बड़ा तूफान है। हम किसी तरह इस तूफान से बाहर निकलना चाहते हैं।' कुल मिलाकर कहें तो यह बुरा सिद्धांत नहीं है। 

(लेखक वैल्यू रिसर्च के सीइओ हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Posted By: Ankit Kumar

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