अरहर 17% और 8 प्रतिशत से अधिक बढ़े चना दाल के दाम! बढ़ती कीमतों और राज्यों की मांग के बीच केंद्र के सामने 2 चुनौतियां
केंद्र सरकार दालों की बढ़ती कीमतों और राज्यों की मांग के बीच बफर स्टॉक बनाए रखने की दोहरी चुनौती का ...और पढ़ें
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दालों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी
HighLights
अरहर और चना दाल की कीमतों में 8-17% तक की वृद्धि।
केंद्र सरकार के सामने बफर स्टॉक और राज्यों की मांग की चुनौती।
मौसम की मार से दाल उत्पादन प्रभावित, आपूर्ति पर दबाव।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| दालों की बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। एक तरफ दक्षिण भारत के बड़े राज्यों समेत कई राज्य सरकारें अपनी वेलफेयर स्कीम्स के लिए तुअर और चना दाल की मांग कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ केंद्र अपने पास मौजूद दालों के बफर स्टॉक को सुरक्षित रखना चाहता है। सरकार का कहना है कि इस स्टॉक का इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर खुदरा बाजार में कीमतें कम करने के लिए किया जाएगा।
एक सरकारी अधिकारी ने मीडिया को बताया कि दक्षिण भारत के कुछ बड़े राज्यों ने एक-एक लाख टन से अधिक अरहर दाल की मांग की है। हालांकि, केंद्र के लिए भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इतनी बड़ी मात्रा में दाल उपलब्ध कराना मुश्किल है।
सरकार की चुनौतियां बढ़ीं
उपभोक्ता मामले मंत्रालय के पास फिलहाल लगभग 45 लाख टन दालों का बफर स्टॉक है। इसमें 11 लाख टन अरहर, 23 लाख टन चना, 6.50 लाख टन मसूर, 3.70 लाख टन मूंग और 70 हजार टन उड़द शामिल हैं।
सरकार इस स्टॉक को बाजार में सप्लाई बढ़ाने और जरूरत पड़ने पर खुदरा कीमतों को कंट्रोल करने के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। ऐसे में राज्यों की मांग पूरी करने और बाजार में हस्तक्षेप के लिए पर्याप्त भंडार बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए चुनौती बन गया है।
अरहर, चना और उड़द दालों की कीमतें बढ़ीं
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सोमवार को देश में अरहर दाल की औसत खुदरा कीमत ₹131.98 प्रति किलो रही। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 17.2 फीसदी अधिक है। इसी तरह चना दाल की कीमत 8.66 फीसदी बढ़कर ₹92.86 प्रति किलो पहुंच गई।
उड़द दाल की कीमत 10.56 फीसदी बढ़कर ₹125.45 प्रति किलो और मूंग दाल की कीमत 4.77 फीसदी बढ़कर ₹114.11 प्रति किलो हो गई। दालों की कीमतों में यह तेजी घरेलू आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा रही है।
मौसम की मार से उत्पादन पर चिंता
दालों की उपलब्धता को लेकर चिंता की एक बड़ी वजह मौसम भी है। प्रमुख दाल उत्पादक क्षेत्रों में कम बारिश और सूखे जैसी परिस्थितियों से अरहर की पैदावार प्रभावित होने की आशंका है। वहीं, मिट्टी में नमी की कमी आने वाले रबी सीजन में चने की बुवाई को प्रभावित कर सकती है।
तुअर खरीफ की फसल है, जिसकी पैदावार के लिए फसल के विकास के दौरान पर्याप्त बारिश जरूरी होती है। दूसरी ओर, चना रबी की प्रमुख फसल है और इसकी बुवाई का सीजन शुरू होने वाला है। उत्पादन में संभावित कमी से आने वाले महीनों में दालों की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
तुअर और चना भारत में खपत होने वाली प्रमुख दालें हैं। दोनों मिलकर देश की कुल दाल खपत में 60% से अधिक हिस्सेदारी रखते हैं। इसलिए इनकी कीमतों में होने वाला बदलाव आम ग्राहकों के घरेलू बजट पर सीधा असर डालता है।
सरकार ने पहले ही नियमों में ढील देने की पहल की
बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार की चिंता पहले भी सामने आ चुकी है। जुलाई में केंद्र ने कृषि मंत्रालय से मूल्य समर्थन योजना (PSS) के उस नियम में ढील देने को कहा था, जिसके तहत सरकारी खरीद से जुटाई गई दालों का निपटान 9 महीने के भीतर करना होता है। इस नियम में ढील देने का उद्देश्य सरकारी भंडार के मैनेजमेंट में अधिक फ्लेक्सिबिलिटी उपलब्ध कराना है, ताकि जरूरत पड़ने पर दालों की आपूर्ति और बाजार में हस्तक्षेप के फैसले लिए जा सकें।
पीली मटर पर आयात शुल्क घटाने की मांग
दालों की सप्लाई बढ़ाने और कीमतों पर दबाव कम करने के लिए उद्योग जगत पीली मटर पर आयात शुल्क घटाने की मांग कर रहा है। फिलहाल पीली मटर के आयात पर 30 फीसदी शुल्क लागू है। दिसंबर 2023 में भारत ने घरेलू बाजार में दालों की उपलब्धता बढ़ाने और तुअर व चना की कीमतों को कंट्रोल करने के लिए पीली मटर के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी थी। इसके बाद 2024 में पीली मटर का आयात बढ़कर लगभग 29.5 लाख टन पहुंच गया, जबकि 2023 तक कई वर्षों से इसका आयात न के बराबर था। इसी दौरान देश का कुल दाल आयात भी रिकॉर्ड लगभग 69 लाख टन पर पहुंच गया।
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पीली मटर अपेक्षाकृत सस्ती होती है और चने के विकल्प के रूप में इस्तेमाल की जाती है। फूड प्रोसेसिंग उद्योग में इसका उपयोग बेसन और अन्य दाल आधारित उत्पादों के लिए किया जा सकता है। बाजार में पीली मटर की उपलब्धता बढ़ने से चने की मांग पर दबाव कम हो सकता है, जिससे कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, केंद्र सरकार ने 1 नवंबर 2025 से पीली मटर पर 30 फीसदी आयात शुल्क लागू कर दिया था, जिससे पहले लागू शुल्क-मुक्त व्यवस्था समाप्त हो गई। अब उद्योग जगत शुल्क में कटौती की मांग कर रहा है, ताकि आयात के जरिए घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाई जा सके।
