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Economic Survey 2026: आर्थिक सर्वेक्षण ने गिनाईं कृषि क्षेत्र की चुनौतियां, रिसर्च में निवेश समेत चार समाधान बताए

Published: Thu, 29 Jan 2026 02:44 PM (GMT+05:30)

आर्थिक सर्वेक्षण 2026 ने कृषि क्षेत्र की चुनौतियों को उजागर करते हुए चार प्रमुख समाधान सुझाए हैं। इनमें सिंचाई मजबूत ...और पढ़ें

बेहतर सिंचाई, रिसर्च में निवेश, उर्वरक इस्तेमाल में सुधार जैसे सुझाव

बेहतर सिंचाई, रिसर्च में निवेश, उर्वरक इस्तेमाल में सुधार जैसे सुझाव

HighLights

  1. सिंचाई, अनुसंधान, उर्वरक सुधार, फसल विविधीकरण चार समाधान।

  2. जलवायु परिवर्तन, जल संकट कृषि की प्रमुख चुनौतियां।

  3. विकसित भारत के लिए कृषि की केंद्रीय भूमिका महत्वपूर्ण।

गुरुवार को संसद में पेश 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण (economic survey 2026) में कृषि क्षेत्र की चुनौतियों से निपटने के लिए चार उपाय बताए गए हैं। इसमें पहला है सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करना, दूसरा है कृषि क्षेत्र में रिसर्च को बढ़ावा, तीसरा है उर्वरकों के इस्तेमाल में सुधार और चौथा है फसलों का विविधीकरण। अब यह देखना है कि रविवार, 1 फरवरी को पेश किए जाने वाले आम बजट (Budget 2026) में इन सिफारिशों को कितना शामिल किया जाता है।

आर्थिक सर्वेक्षण ने कृषि क्षेत्र की प्रमुख प्राथमिकताओं में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने को सबसे पहले रखा है। इसके लिए सिंचाई प्रणाली को मजबूत करने पर जोर देने का सुझाव दिया गया है। इसमें जलाशयों को पुनर्जीवित करना और ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा देना शामिल है। कृषि अनुसंधान एवं विकास को सशक्त बनाने के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के साझा प्रयासों की आवश्यकता है, ताकि जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशीलता बढ़े, उत्पादकता में सुधार हो और किसानों की आय में वृद्धि हो सके।

उर्वरक क्षेत्र में सुधार भी एक अहम प्राथमिकता है, जिसका उद्देश्य टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देना, मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाना और पोषक तत्वों का असंतुलन दूर करना है। इसके अलावा, पानी की उपलब्धता के अनुरूप फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना जरूरी है, जिससे मिट्टी की उर्वरता में सुधार हो, उत्पादकता बढ़े और संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सके।

विकसित भारत के लिए केंद्र में कृषि

Economic Survey में कहा गया है कि विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में कृषि की भूमिका केंद्रीय होगी, क्योंकि यह समावेशी विकास को गति देने के साथ करोड़ों लोगों की आजीविका का भी साधन है। सर्वेक्षण के अनुसार, भारत ने कृषि उत्पादन बढ़ाने में उल्लेखनीय प्रगति की है, खासकर डेयरी, पोल्ट्री, मत्स्य और बागवानी जैसे प्रमुख क्षेत्रों में। इनका देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में महत्वपूर्ण योगदान है।

कोऑपरेटिव के सशक्तीकरण और किसान-उत्पादक संगठनों (FPOs) से ऋण, इनोवेटिव तकनीक और कुशल वैल्यू चेन तक किसानों की पहुंच मजबूत हुई है। ये संस्थाएं किसानों की सामूहिक ताकत बढ़ा कर और उपज के उचित दाम सुनिश्चित कर छोटे व सीमांत किसानों को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। इसके अलावा, डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन जैसी पहल और ई-नाम (e-NAM) को अपनाने से पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।

सस्टेनेबिलिटी और उत्पादकता के लिए खतरा

सर्वेक्षण में कहा गया है कि कृषि क्षेत्र को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जो इसकी सस्टेनेबिलिटी और उत्पादकता के लिए खतरा बन रही हैं। जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। अनियमित मौसम पैटर्न, बढ़ता तापमान और चरम मौसमी घटनाएं फसल उत्पादन को प्रभावित कर रही हैं। मानसून पर निर्भर क्षेत्रों में जल संकट अत्यंत गंभीर समस्या बना हुआ है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए स्थानीय कृषि जलवायु परिस्थितियों और प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के अनुरूप हस्तक्षेप की आवश्यकता है। टिकाऊ कृषि के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी जलवायु सहिष्णु कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना, जलवायु सहिष्णु और सूखा रोधी फसलों की ओर विविधीकरण बेहद जरूरी है।

अनुसंधान एवं विकास में निवेश

हालांकि मजबूत अनुसंधान तंत्र के चलते अनुसंधान एवं विकास में निवेश भारतीय कृषि की एक पहचान रहा है, लेकिन कृषि पद्धतियों में इनोवेशन पर निरंतर ध्यान, कीटों, रोगों और जलवायु प्रभावों को देखते हुए उन्नत बीज किस्मों का विकास, तथा संसाधनों के बेहतर उपयोग वाली आधुनिक खेती को अपनाना उत्पादकता बढ़ाने के लिए निर्णायक होगा। इसके अलावा, प्रिसिजन एग्री टूल्स और डेटा एनालिटिक्स सहित डिजिटल तकनीक को व्यापक रूप से अपनाने से कृषि कार्यों को बेहतर बनाया जा सकता है और फसल उत्पादन के पूर्वानुमान को अधिक सटीक किया जा सकता है।

निरंतर निवेश और इनोवेशन के साथ कृषि क्षेत्र को अधिक लचीला, प्रतिस्पर्धी और आय बढ़ाने वाला बनाया जा सकता है। खाद्य प्रसंस्करण, कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स और उच्च मूल्य वाले कृषि उत्पाद जैसे क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को मजबूत करना घरेलू और निर्यात दोनों बाजारों में प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ाने के लिए अहम होगा। इसके साथ ही बागवानी, एग्रोफॉरेस्ट्री, डेयरी, पोल्ट्री और मत्स्य पालन जैसे उच्च विकास वाले क्षेत्रों का विस्तार ग्रामीण क्षेत्र में समावेशी विकास और रोजगार सृजन को गति दे सकता है।