Economic Survey 2026: यूरिया के दाम बढ़ाने की सिफारिश, कृषि निर्यात पर जब-तब रोक और इथेनॉल ब्लेंडिंग के नुकसान भी बताए
आर्थिक सर्वेक्षण 2026 ने यूरिया की कीमत बढ़ाने और किसानों को नकद हस्तांतरण की सिफारिश की है, ताकि मिट्टी के ...और पढ़ें

यूरिया पर सब्सिडी के कारण नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग
HighLights
यूरिया की कीमत बढ़ाने और किसानों को नकद हस्तांतरण की सिफारिश।
कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए बार-बार प्रतिबंध लगाने से बचने पर जोर।
इथेनॉल ब्लेंडिंग से दलहन-तिलहन को नुकसान, खाद्य सुरक्षा की चिंता।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 (Economic Survey 2026) ने यूरिया के खुदरा मूल्य में मामूली वृद्धि की सिफारिश की है। यूरिया की कीमत मार्च 2018 से नहीं बढ़ी है और यह 242 रुपये प्रति 45 किलोग्राम की बोरी है। सर्वेक्षण में सुझाव दिया गया है कि कीमत बढ़ाने के साथ उतनी ही राशि किसानों को प्रति एकड़ के आधार पर सीधे नकद ट्रांसफर की जाए।
संसद में गुरुवार को पेश किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, इनपुट सब्सिडी से आय बढ़ाने की ओर यह बदलाव उर्वरक उपयोग में तीन दशक पुरानी असंतुलन की समस्या को सुधार सकता है। यह असंतुलन मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है और फसल उत्पादन को कमजोर कर रहा है।
भारतीय किसान अपने खेतों में जो उर्वरक प्रयोग करते हैं, उसमें नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटाश (N:P:K) अनुपात 2009-10 में 4:3.2:1 था, जो 2023-24 में बिगड़कर 10.9:4.1:1 हो गया है। इसका प्रमुख कारण सब्सिडी वाले यूरिया के माध्यम से नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग है।
निर्यात पर जब-तब रोक देश की साख के लिए ठीक नहीं
सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत को कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए अपनी नीतियों में तालमेल बिठाना होगा। जब-तब लगाए जाने वाले व्यापार प्रतिबंधों से बचना होगा, जो सप्लाई चेन को बाधित करते हैं और विश्वसनीय सप्लायर के रूप में देश की साख को नुकसान पहुंचाते हैं।
सर्वेक्षण के अनुसार, कृषि निर्यात “कम प्रयास में बड़े लाभ” जैसा अवसर है जिसमें अपार निर्यात क्षमता है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के प्रभाव को भी मजबूत करता है। इसके लिए ऐसी नीतियों की जरूरत है, जो घरेलू मांग और निर्यात वृद्धि के बीच संतुलन बनाएं।
भारत ने अगले चार वर्षों में कृषि, समुद्री उत्पादों तथा खाद्य एवं पेय पदार्थों के निर्यात को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। वित्त वर्ष 2024-25 में कृषि निर्यात 51.1 अरब डॉलर था। विश्व व्यापार संगठन (WTO) के आंकड़ों के मुताबिक, मूल्य के आधार पर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक होने के बावजूद भारत की वैश्विक कृषि निर्यात में हिस्सेदारी केवल 2.2 प्रतिशत है। यह वर्ष 2000 में 1.1 प्रतिशत थी।
वित्त वर्ष 2019-20 से 2024-25 के बीच कृषि निर्यात की वार्षिक वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही, जो कुल वस्तु निर्यात की 6.9 प्रतिशत की वृद्धि दर से अधिक है। हालांकि वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25 के बीच कृषि निर्यात में ठहराव देखा गया। इस अवधि में वैश्विक कृषि व्यापार 2022 के 2.3 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 2024 में 2.4 ट्रिलियन डॉलर हुआ है।
सर्वेक्षण में चेतावनी दी गई है कि नीतियों में बार-बार बदलाव से निर्यात की सप्लाई चेन गंभीर रूप से बाधित हो सकती है, बाजार में अनिश्चितता पैदा करती है और विदेशी खरीदारों को अन्य स्रोतों की ओर मोड़ सकती है। एक बार खोए हुए निर्यात बाजारों को दोबारा हासिल करना आसान नहीं होता।
इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम से दलहन-तिलहन को नुकसान
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत की ऊर्जा सुरक्षा नीति का एक प्रमुख स्तंभ इथेनॉल-मिश्रित ईंधन कार्यक्रम है। इससे अगस्त 2025 तक देश को विदेशी मुद्रा में 1.44 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुई और लगभग 245 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात की भरपाई की। लेकिन इस कार्यक्रम के कुछ गंभीर नुकसान भी दिख रहे हैं।
इथेनॉल कार्यक्रम अब पारंपरिक गन्ना-आधारित कच्चे माल से बढ़कर खाद्यान्नों, विशेष रूप से मक्का तक फैल गया है। सरकार की मूल्य निर्धारण नीति मक्का-आधारित इथेनॉल के पक्ष में है। इस कारण किसान दलहन और तिलहन से दूर जा रहे हैं। इससे दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा और पोषण को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
सर्वेक्षण के मुताबिक, वित्त वर्ष 2016 के बाद से मक्का की उत्पादकता में 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और यह वर्ष 2025 तक 3.78 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई। इसके विपरीत, सोयाबीन, सूरजमुखी, रेपसीड, मूंगफली और बाजरा जैसी फसलों की उत्पादकता या तो स्थिर रही है या उसमें गिरावट दर्ज की गई है।
सरकार कच्चे माल के प्रकार के आधार पर हर साल इथेनॉल की कीमतें तय करती है और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के जरिए खरीद की व्यवस्था करती है। वित्त वर्ष 2022 से 2025 के बीच मक्का-आधारित इथेनॉल की कीमतों में सालाना 11.7 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई, जो चावल या शीरा-आधारित इथेनॉल की तुलना में अधिक है।
इसका असर साफ दिखा। इस अवधि में मक्का का उत्पादन और रकबा क्रमशः 8.77 प्रतिशत और 6.68 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ा। वहीं दालों के उत्पादन और क्षेत्रफल में गिरावट आई, जबकि तिलहन और अन्य अनाजों में क्रमशः 1.7 प्रतिशत और 2.9 प्रतिशत की मामूली वृद्धि दर्ज की गई। महाराष्ट्र और कर्नाटक में मक्का अब दालों, तिलहनों, सोयाबीन, मोटे अनाज और कपास के साथ सीधे प्रतिस्पर्धा कर रहा है।
