STT Hike: फ्यूचर एंड ऑप्शन प्रीमियम पर सिक्युरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स बढ़ा, शेयर बाजार हुआ धड़ाम
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को फ्यूचर और ऑप्शन पर सिक्योरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) बढ़ा दिया है। फ्यूचर ...और पढ़ें

HighLights
वित्त मंत्री ने फ्यूचर और ऑप्शन पर STT बढ़ाया।
फ्यूचर पर STT 0.02% से बढ़कर 0.05% हुआ।
STT बढ़ने से शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज।
नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार, 1 फरवरी को फ्यूचर और ऑप्शन दोनों पर सिक्योरिटी ट्रैजेक्शन टैक्स (STT) बढ़ा दिया है। फ्यूचर पर सिक्योरिटी ट्रंजैक्शन टैक्स (SETA) को पहले के 0.02% से बढ़ाकर 0.05% कर दिया गया है। फ्यूचर्स पर एसटीटी में 150% और ऑप्शंस पर 50% की बढ़ोतरी हुई है। इस बीच शेयर बाजार क्रैश हो गया है। NSE, BSE में बड़ी गिरावट देखने को मिल रही है।
यह कर कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू के सेल साइड पर लागू होगा। वहीं, ऑप्शंस ट्रेडिंग पर STT पहले की तरह 0.1% ही रहेगा, जो प्रीमियम के सेल साइड पर लगाया जाता है। घोषणा के बाद शेयर बाजार में कमजोरी देखने को मिली। प्रमुख सूचकांक निफ्टी 115 अंकों की गिरावट के साथ 25,250 के स्तर से नीचे कारोबार करता नजर आया।
क्या है सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT)?
सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) भारत में मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों पर होने वाले सिक्योरिटीज लेनदेन पर लगाया जाने वाला प्रत्यक्ष कर है। यह टैक्स इक्विटी शेयरों, इक्विटी म्यूचुअल फंड, फ्यूचर्स और ऑप्शंस जैसे सौदों पर लागू होता है। STT लेनदेन के समय ही वसूला जाता है, चाहे निवेशक को मुनाफा हो या नुकसान।
भारत में STT कब लागू हुआ?
भारत में STT की शुरुआत 1 अक्टूबर 2004 को की गई थी। इसका उद्देश्य इक्विटी और डेरिवेटिव्स ट्रेड में कर चोरी को रोकना, टैक्स कलेक्शन को सरल बनाना और पूंजी बाजार के लेनदेन को औपचारिक कर ढांचे में लाना था। हालांकि, केंद्रीय बजट 2018 में सूचीबद्ध इक्विटी पर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर (LTCG) दोबारा लागू किया गया, जबकि STT को बरकरार रखा गया।
ट्रेडर्स को STT से क्यों है परेशानी?
पिछले बजट में STT में हुई तेज बढ़ोतरी के बाद से ही निवेशकों और ट्रेडर्स की चिंताएं बढ़ी हैं। ऑप्शंस की बिक्री पर टैक्स 0.0625% से बढ़ाकर 0.1% कर दिया गया। फ्यूचर्स ट्रेड पर STT 0.0125% से बढ़कर 0.02% हुआ। हर बार जब कोई निवेशक इक्विटी, डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट या म्यूचुअल फंड की खरीद-बिक्री करता है, तो उसे प्रत्येक लेनदेन पर यह कर चुकाना पड़ता है। ट्रेडिंग की लागत बढ़ने से खासकर शॉर्ट-टर्म और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स पर इसका सीधा असर पड़ता है।
