OYO से 'पंगा' लेना पड़ा भारी! कोर्ट से Zostel को लगा 9वां तगड़ा झटका, क्या है पूरा मामला?
दिल्ली हाई कोर्ट ने PRISM (OYO की पैरेंट कंपनी) के खिलाफ जोस्टेल की याचिका खारिज कर दी, जो इस विवाद ...और पढ़ें

विवाद में अदालतों से सुरक्षा पाने की जोस्टेल की लगातार 9वीं कोशिश नाकाम रही है।

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नई दिल्ली। जोस्टेल के लिए एक और झटका देते हुए, दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को PRISM (OYO की पैरेंट कंपनी) के साथ लंबे समय से चल रहे विवाद में कंपनी की तरफ से दायर मामले का निपटारा कर दिया। इस मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट की 2 जजों की डिवीजन बेंच ने की, जिसने जोस्टेल की याचिका को खारिज कर दिया। बुधवार के आदेश के साथ, इस विवाद में अदालतों से सुरक्षा पाने की जोस्टेल की लगातार 9वीं कोशिश नाकाम रही है। साल 2018 से, जोस्टेल ने अपने पक्ष में फैसला पाने के लिए गुरुग्राम जिला अदालत, कई बार दिल्ली हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की अपीलीय बेंचों का दरवाजा खटखटाया है। इनमें से किसी भी कार्यवाही से कोई ठोस राहत नहीं मिली है।
PRISM के पक्ष में आया आदेश
ताजा अदालती आदेश भी PRISM के पक्ष में है। मई 2025 में, दिल्ली हाई कोर्ट ने उस आर्बिट्रल अवार्ड (मध्यस्थता फैसले) को रद्द कर दिया था जो जोस्टेल के दावों का आधार था। कोर्ट ने कहा कि पार्टियों की टर्म शीट का ज्यादातर हिस्सा बाध्यकारी नहीं था और जरूरी कमर्शियल शर्तों पर पक्के समझौतों के बिना 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' (अनुबंध का पालन) का आदेश नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने अवार्ड को भी खत्म कर दिया, जिससे PRISM पर अब कोई भी लागू करने योग्य दायित्व नहीं बचा है। जोस्टेल ने 2025 में सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। कानूनी जानकारों का कहना है कि इस नए कदम से उस विवाद में एक समानांतर मोर्चा खुल गया है जिसकी सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट में चल रही है। जहां SEBI का काम डिस्क्लोजर स्टैंडर्ड्स यानी जानकारी देने के नियमों की जांच करना है, वहीं अनुबंध से जुड़े दावे पूरी तरह से न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट ने 8 जुलाई को जोस्टेल की नई याचिका खारिज कर दी है। यह उनकी नौवीं ऐसी कानूनी कोशिश थी जिसका कोई नतीजा नहीं निकला। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि हाल की अदालती कार्यवाही के दौरान, जोस्टेल के वकील ने खुद साफ किया कि वे अपने कथित अधिकारों की सुरक्षा का दावा करते हुए IPO प्रक्रिया में कोई रुकावट नहीं डालना चाहते। इसके अलावा, हमने SEBI के सामने जोस्टेल के पक्ष रखने से जुड़ी रिपोर्टों की समीक्षा की है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि PRISM/OYO के पक्ष में बार-बार अदालती फैसले आने के बावजूद, उन दावों को फिर से उठाने की कोशिश की जा रही है जिन्हें पहले ही पूरी कानूनी जांच-पड़ताल के बाद खारिज किया जा चुका है। दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले ही आर्बिट्रेशन अवार्ड को पूरी तरह से रद्द कर दिया था और कहा था कि वे कॉन्ट्रैक्ट लॉ और पब्लिक पॉलिसी के खिलाफ थे। IPO डिस्क्लोज़र प्रक्रिया सख्त रेगुलेटरी नियमों के तहत होती है और PRISM ने लागू कानूनों और नियमों के अनुसार सभी ज़रूरी जानकारी दी है। किसी लंबित विवाद को, खासकर वह जिसमें मूल अवार्ड को रद्द कर दिया गया हो, IPO प्रक्रिया में रुकावट के तौर पर नहीं दिखाया जा सकता। हमारा मानना है कि जिन मामलों पर कानूनी फैसला होना बाकी है, उन्हें अदालती प्रक्रिया के ज़रिए ही सुलझाया जाना चाहिए, न कि समानांतर पक्ष रखकर या रेगुलेटरी कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश करके। हमें PRISM के कानूनी पक्ष की मजबूती पर पूरा भरोसा है और हम न्यायिक और रेगुलेटरी ढांचे पर पूरी तरह भरोसा करते रहेंगे।- चेस्टला, एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के फाउंडर मनीष धीर
यह नया रेगुलेटरी कदम जोस्टेल (Zostel) के फाउंडर्स में से एक और बाद में ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म WinZO के को-फाउंडर बने पावन नंदा की बढ़ती जांच-पड़ताल के बीच उठाया गया है। नवंबर 2025 में, एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ED) ने गेमिंग प्लेटफ़ॉर्म से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के तहत नंदा और WinZO की को-फाउंडर सौम्या सिंह राठौर को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत गिरफ्तार किया। इसके बाद बेंगलुरु की एक अदालत ने एजेंसी को आगे की जांच के लिए 10 दिन की कस्टडी दी। इस साल फरवरी में, ED ने कहा कि उसने नंदा और राठौर द्वारा संचालित और नियंत्रित संस्थाओं से जुड़ी लगभग ₹505 करोड़ की विदेशी संपत्ति को अस्थायी रूप से अटैच किया है।
जोस्टेल के कोर्ट जाने का पूरा मामला (टाइमलाइन)
- फरवरी 2018 में इसकी पहली कोशिश हुई, जब गुरुग्राम जिला अदालत ने अधिकार क्षेत्र (टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन) की कमी के कारण इसकी धारा 9 की याचिका खारिज कर दी।
- जनवरी 2020 में, दिल्ली हाई कोर्ट ने इसकी धारा 9 की याचिका को बिना कोई अंतरिम राहत दिए आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के पास भेज दिया।
- जुलाई 2020 में, आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने जोस्टेल की मुख्य अंतरिम राहतों को खारिज कर दिया, जिसमें बैंक गारंटी की मांग भी शामिल थी।
- 14 फरवरी 2022 को, जोस्टेल ने फिर से दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया और OYO के प्रस्तावित IPO पर रोक लगाने, अपनी कथित हिस्सेदारी का 7% तक एस्क्रो में रखने और कंपनी के शेयरहोल्डिंग स्ट्रक्चर में बदलाव को रोकने की मांग की, लेकिन कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि शेयरों के आवंटन या विशिष्ट प्रदर्शन (स्पेसिफिक परफॉर्मेंस) का निर्देश देने वाला कोई अवार्ड नहीं था।
- 13 मई 2025 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने PRISM की धारा 34 के तहत चुनौती को स्वीकार कर लिया और आर्बिट्रल अवार्ड को पूरी तरह से रद्द कर दिया।
- 29 जुलाई 2025 को, जोस्टेल ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी स्पेशल लीव पिटिशन वापस ले ली, जिसे कानून के अनुसार उपाय करने की छूट के साथ वापस लिया हुआ मानकर खारिज कर दिया गया।
- मई 2025 के फैसले के खिलाफ जोस्टेल की धारा 37 की अपील दिल्ली हाई कोर्ट में अभी भी लंबित है।
- 12 अगस्त 2025 को, कोर्ट द्वारा यह नोट किए जाने के बाद कि कोई निष्पादन कार्यवाही (एग्जीक्यूशन प्रोसीडिंग्स) लंबित नहीं है, इसने प्रवर्तन कार्यवाही (एनफोर्समेंट प्रोसीडिंग्स) में अपनी अपील भी वापस ले ली।
हाल ही में, बुधवार की सुनवाई से कुछ दिन पहले, जोस्टेल ने PRISM के IPO खुलासों को लेकर SEBI से संपर्क किया, जबकि साथ ही दिल्ली हाई कोर्ट में अपनी लंबित अपील पर भी कार्यवाही जारी रखी।
