Yes Bank की कहानी: राणा कपूर की गलतियां, RBI की 'सर्जिकल स्ट्राइक' से शेयरों के 98% टूटने तक, कैसा है पूरा सफर?
Yes Bank News: यस बैंक की कहानी उसके 2020 के संकट, राणा कपूर की गलत नीतियों और आरबीआई के हस्तक्षेप ...और पढ़ें

कैसा है यस बैंक का सफर?
HighLights
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यस बैंक के शेयर 14% गिरे।
राणा कपूर की गलत नीतियों से बैंक 2020 में संकट में आया।
आरबीआई के बचाव अभियान से बैंक ने शानदार वापसी की।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| देश का 5वां सबसे बड़ा प्राइवेट बैंक, यस बैंक फिर से चर्चा में है। वजह है- सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा फैसला, जिसके आते ही बैंक के शेयरों में 14% तक की भारी गिरावट (Yes Bank Share Crash) आ गई। मामला 8,415 करोड़ रुपए के एडिशनल टियर-1 (AT-1) बॉन्ड का है। इन बॉन्ड्स में आम और बड़े निवेशकों ने पैसा लगाया था। जब 2020 में यस बैंक कंगाली की कगार पर पहुंचा और RBI ने उस पर पाबंदियां लगाईं, तब बैंक के प्रशासक ने इन 8,415 करोड़ के बॉन्ड्स की वैल्यू को जीरो यानी बट्टे खाते में कर दिया था।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि साल 2020 में क्या हुआ था? कैसी यस बैंक की कहानी? चलिए इस खबर में समझते हैं- यस बैंक की दिलचस्प कहानी।
5 मार्च की वो शाम, जब RBI ने लिया एक्शन
5 मार्च 2020 की शाम शायद ही कोई भूल पाया हो। अचानक खबर आई कि रिजर्व बैंक (RBI) ने यस बैंक का बोर्ड भंग कर दिया है और अब ग्राहक 50,000 रुपए से ज्यादा नहीं निकाल पाएंगे। देखते ही देखते नेट बैंकिंग ठप हो गई और देशभर में एटीएम के बाहर लोगों की घबराई हुई लंबी लाइनें लग गईं। लोगों की जिंदगी भर की कमाई फंस चुकी थी। शेयर बाजार में भूचाल आ गया। अगले ही दिन बैंक का शेयर 36.85 रुपए से लुढ़क कर 5.55 रुपए पर आ गिरा। कुछ ही दिनों बाद जब नतीजे आए, तो बैंक को 18,564 करोड़ रुपए का घाटा हुआ था- यह उस वक्त भारतीय बैंकिंग इतिहास का सबसे बड़ा घाटा था।
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कैसे डूबा देश का 5वां सबसे बड़ा बैंक?
यस बैंक की इस हालत के पीछे कोई बाहरी तूफान नहीं, बल्कि बैंक के ही फाउंडर राणा कपूर की नीतियां थीं। बैंक ने आंख मूंदकर ऐसी कंपनियों को लोन बांटे जो पहले से ही कर्ज में डूबी थीं। इनमें आईएलएंडएफएस (IL), अनिल अंबानी समूह, कैफे कॉफी डे, एस्सेल और डीएचएफएल जैसी कंपनियां शामिल थीं।
साल 2014 में बैंक का कुल कर्ज 55,000 करोड़ था, जो 2019 तक बेलगाम होकर 2.41 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया। जब ये बड़े कर्ज वापस नहीं आए (NPA बन गए), तो राणा कपूर के नेतृत्व में बैंक ने इन्हें बही-खातों में छिपाना शुरू कर दिया। साल 2016-17 में ही करीब 6,000 करोड़ रुपए के डूबे कर्ज छिपाए गए।
जब आरबीआई को इस गड़बड़ी की भनक लगी, तो उसने 2018 में राणा कपूर का कार्यकाल बढ़ाने से इनकार कर दिया। इसके बाद बैंक भरभरा कर गिर पड़ा। 2018 में जो शेयर 404 रुपए का था, वह दो साल में 98% से ज्यादा टूट चुका था।
RBI की 'संजीवनी' और वापसी की कहानी
जब लगा कि यस बैंक का नामोनिशान मिट जाएगा, तब आरबीआई ने एक तगड़ा रेस्क्यू प्लान तैयार किया। बैंक की कमान एसबीआई के पूर्व एमडी प्रशांत कुमार को सौंपी गई। एसबीआई (SBI), एचडीएफसी (HDFC), आईसीआईसीआई (ICICI), एक्सिस और कोटक (Axis and Kotak Bank) जैसे दिग्गज बैंकों ने मिलकर यस बैंक में 10,350 करोड़ रुपए की ऑक्सीजन (पूंजी) फूंकी।
जुलाई 2022 में बैंक ने अपने 48,000 करोड़ रुपए के डूबे हुए कर्जों (बैड लोन) के कचरे को एक रिकवरी कंपनी को 8,046 करोड़ में बेचकर अपनी बैलेंस-शीट साफ कर ली। जमाकर्ताओं पर 5 लाख रुपए का बीमा कवर था, जिससे लोगों का भरोसा लौटा और 18 मार्च 2020 को पैसे निकालने की पाबंदी भी हटा ली गई।
आज कहां खड़ा है यस बैंक?
2004 में जिस बैंक का नाम बोर्ड मेंबर ने YES (यानी सकारात्मकता और सेवा भाव का प्रतीक) रखा था, वह आज सच में उसी राह पर लौट आया है। जापानी कंपनी SMBC (24.22% हिस्सेदारी), LIC और SBI के मजबूत साथ से बैंक फिर मुनाफे में है।
आंकड़े खुद कहानी बयां करते हैं। 2020 से 2025 के बीच ग्राहकों की जमा पूंजी 1.05 लाख करोड़ से बढ़कर 2.85 लाख करोड़ रुपये हो चुकी है। जो बैंक 2020 में 16,433 करोड़ के भयानक घाटे में था, उसने वित्त वर्ष 2026 तक आते-आते 3,476 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा कमा लिया है।
बैंक का नेट एनपीए (NPA) अब 5% से घटकर मात्र 0.3% रह गया है और कुल संपत्ति 4.69 लाख करोड़ रुपये हो चुकी है।
भविष्य का क्या है प्लान?
आज 1,334 शाखाओं और 29,573 कर्मचारियों के साथ बैंक मजबूती से खड़ा है। निचले स्तर से शेयर भी करीब 4 गुना चढ़कर 20 रुपए के आसपास आ गया है। आने वाले 4 से 5 सालों में बैंक की 400-500 नई शाखाएं खोलने की योजना है, जिसका पूरा फोकस एमएसएमई (MSME), रिटेल और किसानों पर होगा।
HDFC और ICICI जैसे कड़े प्रतिद्वंद्वियों के बीच यस बैंक की यह वापसी बताती है कि अगर नीयत साफ हो और मैनेजमेंट सही हाथों में हो, तो सबसे गहरे गड्ढे से भी बाहर निकला जा सकता है। हालांकि, अब देखने वाली बात यह होगी कि आखिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बैंक पर क्या असर पड़ता है?
