मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

मान लीजिए कि कोई क्रिकेटर मैदान में बल्लेबाजी के लिए आया है। जैसे ही वह 28 रनों पर पहुंचता है, हैलमेट उतारकर दर्शकों का ऐसे अभिवादन करता है जैसे कि उसने शतक जड़ दिया हो। आखिर उसने ऐसा क्यों किया? उसने ऐसा इसलिए किया कि उससे पहले तक उसका बल्लेबाजी औसत 27.6 रन प्रति मैच का ही था। उसने उस औसत को पार कर लेने को ही अपना नया बेंचमार्क माना हुआ था। जैसे ही उसने उस औसत को पार किया, उसको लगा कि वह सफल हो चुका है।

सिर्फ क्रिकेट की बात नहीं : यह महज एक मजाक है। लेकिन यह क्रिकेट का नहीं, बल्कि सही मायनों में निवेश क्षेत्र का मजाक है। दुनिया का कोई भी बल्लेबाज अपने औसत से ऊपर पहुंचने मात्र से खुशी जाहिर करने नहीं लग जाता। लेकिन ऐसे बहुत से निवेश प्रबंधक या इन्वेस्टमेंट मैनेजर हैं, जो ऐसा ही व्यवहार करते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने औसत प्रदर्शन के एकाध मानक को पार कर लिया, तो वे अपने ग्राहकों की जरूरतें पूरी करने में सफल हो गए।

यह सोच ग्राहकों में भी गहरे तक पैठ गई सी लगती है। आखिर एक बचतकर्ता और निवेशक के तौर पर कोई व्यक्ति कौन सा मुकाम हासिल करना चाहता है? क्या केवल किसी औसत या किसी बेंचमार्क को पीछे छोड़ देना मात्र उसका मकसद है? बहुत से निवेशकों को यही लगता है कि जब तक वे ऐसे लक्ष्य हासिल करते रहे हैं, तब तक वे सफल हैं। अगर वे निश्चित आय वाले उपकरणों में निवेश करते हैं, तो वे सावधि जमा या एफडी की दर को बेंचमार्क मान लेते हैं। या अगर वे इक्विटी में निवेश करते हैं तो निफ्टी या सेंसेक्स से अधिक के रिटर्न को बेंचमार्क बना लेते हैं। असल में मीडिया और अधिकांश विश्लेषक भी इसी सोच को मजबूती देते नजर आते हैं। हर वर्ष के अंतिम दिनों में अखबार, पत्रिकाएं या वेबसाइट इन खबरों, तालिकाओं या टेबल, ग्राफ और विश्लेषणों से अटे पड़े दिखते हैं कि बीते वर्ष के दौरान किसने कैसा प्रदर्शन किया। इस तरह के आंकड़े सिर्फ उनके काम आते हैं, जो पहली जनवरी को निवेश करते हैं और 31 दिसंबर को उसे भुना लेना चाहते हैं। यूंह कहें तो यह सबके काम का नहीं है।

कोई भी व्यक्ति, जो इन पैमानों पर निवेश करता है या करना चाहता है, बहुत संभव है कि वह बेहद सामान्य निवेश में उलझकर रह जाए। क्योंकि यह संभव है कि आमतौर पर प्रचलित कई औसत बेंचमार्क से बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद कोई निवेशक बिल्कुल खाली हाथ वापस लौटे। बिल्कुल उसी क्रिकेटर की तरह, जिसका जिक्र हमने इस आलेख की शुरुआत में किया था।

किस दौड़ में हैं आप: ऐसे में वह असली बेंचमार्क कौन सा है, जिसका किसी निवेशक को अनुसरण करना चाहिए? उसका आधार क्या होना चाहिए? इसका सबसे करीबी जवाब यह है कि उसे आपकी जरूरतें पूरी करने वाला होना चाहिए। यहां जरूरत से आशय उन तरीकों से है, जिनसे आप निवेश करना चाहते हैं। इसका आशय इस बात से भी है कि आप अपने निवेश से किस तरह की उम्मीद रखते हैं। हममें से ज्यादातर लोगों के पास हर महीने कुछ न कुछ ऐसी रकम होनी चाहिए या होती है, जिसका हम निवेश कर सकते हैं। बेहतर रिटर्न और सुरक्षा के लिहाज से भी नियमित मासिक निवेश सबसे बेहतर तरीका है। मैंने वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन पर मासिक एसआइपी इक्विटी फंड्स के निवेश प्रदर्शन का आकलन किया और पाया कि लगभग सभी फंड सामान्य बेंचमार्क से बेहतर प्रदर्शन करते रहे हैं।

मेरे ऐसा कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि बेहतर बेंचमार्क सिर्फ वह है, जो आपके लिए आपके हिसाब से विशिष्ट हो, जो आपकी जरूरतों पर आधारित हो। सामान्य बेंचमार्क हमेशा बड़ी संख्या में निवेश के औसत पर आधारित होता है। लेकिन आपके व्यक्तिगत बेंचमार्क के भी उसी पर आधारित होने का कोई तुक नहीं है। इसके विपरीत उसे पूरी तरह आपकी जरूरतों पर आधारित होना चाहिए। क्या आपका निवेश आपकी जरूरतें पूरी करने के रास्ते पर चल रहा है? क्या आपने अतीत के लक्ष्यों को हासिल करने में सफलता पाई है? ये सवाल, या कहें तो इन सवालों के जवाब ही सबसे महत्वपूर्ण हैं। अगर इनमें से ज्यादातर सवालों के जवाब ‘ना’ में हैं, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके निवेश ने सेंसेक्स या निफ्टी के बेंचमार्क को पीछे छोड़ दिया। इसका सीधा मतलब है कि आपको उस दौड़ में होना ही नहीं था।

कई दूसरे मामलों में हम पाते हैं कि जब तक आप चलते रहते हैं और थोड़ी भी गति बरकरार रहती है, आप मंजिल के करीब पहुंचते जाते हैं। लेकिन निवेश और बचत के मामलों में ऐसा नहीं है। भविष्य में आपको कितनी रकम की जरूरत होगी, उसके लिए आप उचित निवेश करेंगे और निवेश के दौरान ही यह जानकारी लेंगे कि आप लक्ष्यों तक पहुंच रहे हैं कि नहीं- लेकिन यह सब आसान काम नहीं है। दुर्भाग्य से यह जानने का कोई दूसरा आसान रास्ता भी नहीं है।

आम बचतकर्ता और निवेशक आंख मूंदकर कुछ बेंचमार्क का अनुसरण करते पाए जाते हैं। वे इस बात से ही खुश हो जाते हैं कि उनका निवेश बाजार के कुछ प्रचलित बेंचमार्क से बेहतर रहा है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कि कोई बल्लेबाज शतक लगाने से पहले ही किसी अंक पर पहुंचकर यह सोचकर खुशियां मनाने लगे कि उसने पहला बेंचमार्क पार कर लिया है। ज्यादातर निवेशकों और बचतकर्ताओं के साथ ऐसा ही हो रहा है। वे अपनी जरूरतों के हिसाब से बेंचमार्क का निर्धारण करने के बजाय बाजार और अन्य पक्षों द्वारा पेश कुछ प्रचलित बेंचमार्क को अपना लेते हैं। इसी वजह से अक्सर ही उनका निवेश भविष्य की जरूरतें पूरी करने में विफल साबित होता है।

(लेखक, धीरेंद्र कुमार, वैल्यू रिसर्च के सीईओ हैं) 

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Posted By: Nitesh

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