नई दिल्ली (जयप्रकाश रंजन)। क्या बैकिंग नियामक आरबीआइ कर्ज नहीं चुकाने वालों के नाम सार्वजनिक करने के मुद्दे पर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ताक पर रखने को आमादा है? राज्यसभा में वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने एक लिखित सवाल का जो जवाब दिया है, उससे कुछ ऐसे ही आसार नजर आते हैं।

वित्त राज्य मंत्री ने अपने जवाब में 25 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज नहीं चुकाने वाले खाताधारकों (डिफॉल्टर्स) की संख्या (1,938) तो बता दी, लेकिन उनके नाम सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया। उन्होंने बताया कि, आरबीआइ की तरफ से यह बताया गया है कि आरबीआइ कानून 1935 की धारा 45ई के तहत ग्राहकों के कर्ज से जुड़ी सूचना को गोपनीय रखने का प्रावधान है और इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। वित्त राज्य मंत्री का यह जवाब इसलिए महत्वपूर्ण है कि अप्रैल, 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में आरबीआइ के इस तर्क को खारिज कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआइ को ग्राहकों की सूचना को सार्वजनिक नहीं करने के मौजूदा प्रावधानों को निरस्त करने को भी कहा था, ताकि सूचना के अधिकार कानून (आरटीआइ) के तहत उन लोगों के नाम सार्वजनिक किए जा सकें, जो जान बूझकर बैंकों के कर्ज को नहीं लौटाते हैं। यही नहीं, इसके पहले साल 2015 में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह का आदेश दिया था कि बैंकों के कर्ज नहीं लौटाने वालों के नाम छिपाने वाले प्रावधानों को हटाया जाना चाहिए। इसका उल्लेख अप्रैल, 2019 के आदेश में भी किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने बैंकिंग क्षेत्र के नियामक को चेतावनी देते हुए कहा था कि वह आदेश को गंभीरता से ले, नहीं तो कार्रवाई की जा सकती है।

मंगलवार को राज्य सभा में आरबीआइ की तरफ से सरकार का जो जवाब आया है, उससे साफ है कि केंद्रीय बैंक के रूख में कोई बदलाव नहीं आया है। वित्त राज्य मंत्री ने बताया कि 31 मार्च, 2019 तक देश में 25 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज नहीं चुकाने वाले कुल 1,938 ग्राहक हैं। जहां तक इनके नाम को बताने की बात है तो आरबीआइ ने सूचना दी है कि उसे आरबीआइ एक्ट, 1935 की धारा 45ई के तहत ग्राहकों के कर्ज से जुड़ी सूचना देने का अधिकार नहीं है। आरबीआइ ने कर्ज वापसी नहीं होने के लिए जरुरत से ज्यादा कर्ज देना, जान बूझकर कर्ज नहीं चुकाना, धोखाधड़ी और कुछ मामलों में भ्रष्टाचार को जिम्मेदार ठहराया है।

आरबीआइ मानता है कि वर्ष 2008 से वर्ष 2014 के बीच बढ़-चढ़कर दिया गया कर्ज भी बढ़े एनपीए (फंसे कर्जे) के लिए जिम्मेदार है। केंद्रीय बैक के आंकड़े के मुताबिक 31 मार्च, 2008 में बैंकों की तरफ से दिया गया कर्ज 18,19,204 करोड़ रुपये का था, जो मार्च, 2014 में बढ़ कर 52,15,920 करोड़ रुपये हो गया था। यह भी एक वजह रहा कि 31 मार्च, 2018 को देश के सरकारी बैंकों का कुल एनपीए 8,95,601 करोड़ रुपये हो गया था। सरकार का कहना है कि उसकी कोशिशों की वजह से 31 मार्च, 2019 में यह घट कर 7,89,569 करोड़ रुपये रह गया है।

Posted By: Pawan Jayaswal

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