नई दिल्ली जागरण ब्यूरो]। विकास दर की रफ्तार थमने के साथ ही देश के वित्तीय क्षेत्र की स्थिति भी डांवाडोल हो गई है। अमेरिका की आर्थिक नीतियों और ग्लोबल अस्थिरता की वजह से रुपये की साख को और धक्का पहुंचने की आशंका है। वहीं देश का बैंकिंग क्षेत्र फंसे कर्ज [एनपीए] के दलदल में और गहरे धंस सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक [आरबीआइ] ने वित्तीय क्षेत्र की मजबूती पर गुरुवार को जारी अपनी रिपोर्ट में काफी चिंताजनक टिप्पणियां की है।

आरबीआइ ने कहा है कि पिछले छह महीनों के दौरान देश ंकी अर्थंव्यवस्था के समक्ष चुनौतियां बढ़ी हैं। विकास दर बहुत कम हो चुकी है और कंपनियों का प्रदर्शन भी खराब है। निर्यात की स्थिति भी निराशाजनक है। इस स्थिति के लिए रिजर्व बैंक गवर्नर डी. सुब्बाराव ने सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने रिपोर्ट की शुरुआत में लिखा है कि समय पर नीतियां नहीं बनाने और उन्हें लागू नहीं करने, आपूर्ति पक्ष की दिक्कतों को दूर नहीं करने से भी विकास दर पर असर पड़ा है। अभी भी निवेशक यही सोचते हैं कि भारत में कारोबार करना मुश्किल है। इससे देश में निवेश लायक माहौल बनाने में कठिनाई आ रही है। हाल के दिनों में महंगाई की स्थिति ठीक हुई है लेकिन चालू खाते के घाटे को लेकर अनिश्चितता बरकरार है।

इस आधार पर रिजर्व बैंक ने कहा है कि अगर हालात को नहीं संभाला गया तो पूरे वित्तीय क्षेत्र के समक्ष कई तरह की चुनौतियां पैदा हो जाएंगी। खास तौर पर बैंकों के लिए कई तरह की चिंताएं जताई गई हैं। बैंकों के एनपीए की समस्या और बिगड़ सकती है। वैसे भी बैंकों की कर्ज देने की रफ्तार काफी धीमी हो गई है। हाल के हफ्तों में देश से बाहर बड़ी संख्या में विदेशी मुद्रा बहिर्गमन का जिक्र करते हुए संकेत दिया गया है कि आने वाले दिनों में भारत से विदेशी मुद्रा निकालने की रफ्तार और तेज हो सकती है। इससे पहले से खस्ताहाल रुपये को और चूना लग सकता है।

आरबीआइ ने अपनी रिपोर्ट में कुछ बैंकों व बीमा कंपनियों पर लगे संगीन आरोपों को गंभीर माना है। इसमें कहा गया है कि गलत सूचना देकर उत्पाद बेचने की प्रवृत्ति से देश के वित्तीय संस्थानों को बचना होगा।

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