राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर मध्य प्रदेश के बासमती चावल की जीआइ (जियोग्राफिल इंडीकेशन) टैगिंग देने को रोक लगाने की मांग की है। प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि जीआइ टैगिंग व्यवस्था में छेड़छाड़ से भारतीय बासमती के 33 हजार करोड़ के निर्यात बाजार को नुकसान हो सकता है और इसका लाभ पाकिस्तान को मिल सकता है। भारत में हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तर-प्रदेश और जम्मू और कश्मीर के कुछ क्षेत्र में पैदा होने वाली बासमती की ही जीआइ टैगिंग की जाती है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर एसोसिएशन ने भी इसका कड़ा विरोध किया है।

कैप्टन ने मोदी से कहा है कि भारत में बासमती की खेती करने वाले किसानों और निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए वे अधिकारियों को जीआइ टैगिंग की व्यवस्था में छेड़छाड़ करने से रोकें। मुख्यमंत्री ने कहा है कि जियोग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ गुड्स (रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन) एक्ट, 1999 के तहत जीआइ टैग उन कृषि उत्पादों को दिया जाता है जो किसी क्षेत्र विशेष में विशेष गुणवत्ता और विशेषताओं के साथ उत्पन्न होता है। इन विशेषताओं के चलते ही ऐसे उत्पादों को उनके भौगोलिक उत्पत्ति के आधार पर जीआइ टैगिंग दी जाती है। भारत में जाआइ टैगिंग वाले बासमती को उसकी गुणवत्ता, स्वाद और खुशबू के लिए दी जाती है। 

हिमालय की तलहटी में बसे क्षेत्रों में इंडो-गेंजेटिक क्षेत्र में पैदा होने वाली बासमती का स्वाद और खुशबू की पहचान सारे विश्व में विख्यात है। उन्होंने कहा है कि मध्य प्रदेश, बासमती का उत्पादन करने वाले इस इस विशेष क्षेत्र में नहीं आता। इसीलिए इसे पहले ही इसमें शामिल नहीं किया गया था। अब मध्य प्रदेश को इसमें शामिल करना ना सिर्फ जीआइ टैगिंग एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन होगा बल्कि यह इसके उद्देश्य को ही बर्बाद कर देगा।

मुख्यमंत्री ने कहा है कि इससे पहले 2017-18 में भी मध्य प्रदेश ने जीआइ टैगिंग हासिल करने का प्रयास किया था पर तब जीआइ टैगिंग के रजिस्ट्रार और इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी अपीलेट बोर्ड ने भी खारिज कर दिया था। मद्रास हाई कोर्ट से भी मध्य प्रदेश को राहत नहीं मिली थी। यही नहीं भारत सरकार द्वारा गठित की गई कृषि विज्ञानियों की समिति ने भी इस दावे को खारिज कर दिया था।

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