सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली। सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में खामियां गिनाते हुए कई राज्यों ने इससे खुद को अलग कर लिया है। इनमें से ज्यादातर राज्यों ने अपनी अलग फसल बीमा योजना लागू की है, जिसमें भाजपा शासित राज्य भी शामिल हैं। कृषि मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति ने फसल बीमा योजना की खामियों को दूर कर सभी राज्यों को उसके दायरे में लाने की सिफारिश की है। किसानों को उनकी खेती के जोखिम से बचाने के लिए रक्षा कवच के रूप में सरकार ने जोर-शोर से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत की थी।

इसमें किसानों को न्यूनतम प्रीमियम भुगतान के साथ कई और रियायतें दी गई। इसके बावजूद आधा दर्जन से अधिक राज्यों ने इससे खुद को अलग कर लिया है। पंजाब वर्ष 2016 में इस योजना की शुरुआत से ही इससे अलग रहा था। बिहार ने वर्ष 2018 में और पश्चिम बंगाल ने खरीफ सीजन, 2019 से इसे वापस ले लिया है। आंध्र प्रदेश, गुजरात, तेलंगाना और झारखंड ने भी वर्ष 2020 से इस योजना को बंद कर दिया है। इनमें लगभग सभी राज्यों ने वित्तीय संकट और मौसम के सामान्य रहने के दौरान दावों का कम भुगतान होने से योजना को लागू नहीं किया।

वैसे कई राज्यों में उनकी अपनी फसल बीमा योजना चली जा रही है। संसद की स्थायी समिति ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू करने को लेकर राज्यों के समक्ष आ रही चुनौतियों और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की खामियों को दूर करने की सिफारिश की है। समिति ने कहा है कि राज्यों की ओर से योजना के लागू न करने की वजहों का विस्तार से अध्ययन करना और जरूरी कदम उठाकर योजना को देशव्यापी बनाया जाना चाहिए।

योजना की चुनौती

योजना के तहत किसानों द्वारा दिया जाने वाला न्यूनतम प्रीमियम छोड़कर बाकी हिस्सा केंद्र और राज्य आधा-आधा भरते हैं। राज्यों के प्रीमियम जमा करने में होने वाली देरी से किसानों को मुआवजा मिलने में भी दिक्कतें आती हैं।

राज्यों का यह तर्क

पंजाब की तरह अन्य राज्यों का भी तर्क है कि उनके यहां किसानों को नुकसान नहीं के बराबर होता है, लिहाजा योजना उनके लिए उपयुक्त नहीं है। हालांकि देशभर में इस योजना की कवरेज 37 फीसद पर पहुंच चुकी है। कई संशोधनों के तहत योजना को स्वैच्छिक बना दिया गया है।

Edited By: Nitesh