नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क)। भारतीय रुपये में एक दिन में 110 पैसे की गिरावट ने इस बात के साफ संकेत दे दिए हैं कि दूसरे देशों की संरक्षवादी नीतियों का खामियाजा भारत को भी भुगतना पड़ सकता है। जानकारों की राय में रुपये की इस गिरावट के पीछे मुख्य तौर पर तुर्की से आयात पर अमेरिका की तरफ से लगाई जाने वाली शु्ल्क की दरें हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले ने तुर्की की मुद्रा लीरा को औंधे मुंह गिरा दिया, जिसका असर दुनिया के तमाम देशों की मुद्रा के साथ भारतीय रुपये पर भी दिखाई दिया है।

तुर्की जिस तरह के आर्थिक संकट में फंसता दिख रहा है उसका असर भारतीय रुपये पर पड़ने को लेकर वित्त मंत्रालय व रिजर्व बैंक भी सतर्क हैं। जानकारों का मानना है कि जिस तरह का वैश्विक माहौल बना हुआ है उसमें भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को लेकर बहुत आक्रामक हस्तक्षेप नहीं करना चाहेगा। क्योंकि भारतीय रुपये की कीमत को थामने का मतलब होगा भारतीय निर्यात पर असर डालना।

आरबीआइ के सूत्रों के मुताबिक समस्या यह नहीं है कि तुर्की पर आर्थिक संकट गहरा रहा है बल्कि अन्य अंतरराष्ट्रीय बैंकों की तरह हमारी यह चिंता है कि इस तरह का संकट चीन की मुद्रा के साथ उत्पन्न नहीं हो। गौरतलब है कि तुर्की की मुद्रा में गिरावट का दोष अमेरिका की तरफ से लगाये गये नए शुल्क पर मढ़ा जा रहा है। अमेरिका इसी तरह का शुल्क चीन के उत्पादों पर भी लगा रहा है। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी आयात को हतोत्साहित करने के लिए नए शुल्क लगाये हैं। ऐसे में यह कयास लगाया जा रहा है कि तुर्की मुद्रा लीरा से उत्पन्न हुआ संकट चीन की मुद्रा युआन में भी फैल सकता है। यह भारत के लिए ज्यादा संकट की बात होगी। इसकी वजह यह है कि तुर्की के साथ भारत का द्विपक्षीय कारोबार महज 6.5 अरब डॉलर का है, जबकि चीन व भारत का द्विपक्षीय कारोबार तकरीबन 70 अरब डॉलर का है। तुर्की के मामले में व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है जबकि चीन के साथ व्यापार संतुलन भारत के खिलाफ बहुत ज्यादा है।

इकरा लिमिटेड की प्रमुख अर्थशास्त्री अदिति नायर मानती हैं कि भारतीय रुपया कुछ समय के लिए अभी 70 स्तर को भी पार कर लेगा, लेकिन अंत में यह 69 के आस-पास रहेगा। उनके मुताबिक आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों और डॉलर के मुकाबले दुनिया की दूसरी मुद्राओं का प्रदर्शन भी भारतीय रुपये की कीमत को तय करेगा।

उन्होंने उम्मीद जताई है कि भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा बाजार को लेकर अब ज्यादा सक्रिय होगा। भारत में विदेशी मुद्रा का भंडार की स्थिति अच्छी है, जो एक शुभ संकेत है। लेकिन आरबीआइ तब ज्यादा सक्रिय नहीं होगा जब दूसरे विकासशील देशों की मुद्रा में भी गिरावट हो, जैसा कि संकेत है। इन देशों के मुकाबले अपने निर्यात को बचाने के लिए भारतीय रुपये की कीमत को लेकर ज्यादा हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

Posted By: Surbhi Jain

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