नई दिल्ली, बिजनेस डेस्क। पाकिस्तान की सत्ता में आर्मी की धमक कई दशक से सुनाई देती रही है और देश के अस्तित्व के 72 साल में लगभग 36 साल वहां सेना का शासन रहा है। हालांकि, अर्थव्यवस्था में पाकिस्तान की सेना की सीधी दखल के बारे में बहुत कम ही सुनने को मिला है लेकिन हाल की खबरों के मुताबिक पाकिस्तान के आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा ने हाल में देश की इकोनॉमी को लेकर शीर्ष कारोबारियों के साथ बैठक की है। न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक रिपोर्ट के मुताबिक बाजवा ने ये बैठकें पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी कराची और रावलपिंडी में भारी सुरक्षा वाले सैन्य कार्यालयों में की।  

ब्लूमबर्ग ने इस घटनाक्रम से अवगत सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि बैठक के दौरान बाजवा ने कारोबारियों से ये जानना चाहा कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए क्या कदम उठाये जाने चाहिए और उन्हें निवेश के लिए प्रेरित करने वाले कारक कौन-से होंगे। सूत्रों ने बताया कि कुछ बैठकों के बाद तत्काल कदम उठाये गए एवं शीर्ष अधिकारियों को जरूरी ऑर्डर दिये गए। सूत्रों ने बताया कि बाजवा कारोबारी समुदाय में विश्वास बहाली को लेकर चिंतित दिखे।

हालांकि, सेना के एक प्रवक्ता से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने किसी भी टिप्पणी से इंकार कर दिया।

उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में सुस्ती का सीधा असर वहां की सेना पर देखने को मिला है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वित्त वर्ष 2019-20 में सेना के बजट को फ्रीज कर दिया गया है। ऐसा एक दशक से भी अधिक समय में पहली बार देखने को मिला है। 

इस ताजा घटनाक्रम के साथ यह भी दिलचस्प है कि पाकिस्तान के कई कारोबारियों और आर्थिक विश्लेषकों ने सेना की अधिक भूमिका का स्वागत किया है। उनका मानना है कि प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी के मुकाबले सेना अर्थव्यवस्था के मोर्चे के संभालने के लिए ज्यादा अनुभवी है। पाकिस्तान में सेना को सबसे अधिक सम्मान की नजर से देखा जाता है इसलिए विश्लेषकों को लगता है कि ये हालिया घटनाक्रम बेहद स्वागतयोग्य है। 

हालांकि, बहुत से लोग सेना की बढ़ती भूमिका की वजह से काफी चिंतित भी हैं क्योंकि उनका मानना है कि सेना पाकिस्तान के लोकतंत्र को कमजोर कर देती है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में सेना कई मौकों पर तख्तापलट की कोशिश कर चुकी है। हालांकि, आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक व्यवस्था, विदेश नीति और रणनीतिक मामलों में सेना का हमेशा से दखल रहा है।

Posted By: Ankit Kumar

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