जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली । विजय माल्या के विदेश जाने के बाद फंसे कर्जे (एनपीए-नॉन परफॉरमिंग एसेट्स) को लेकर जिस तरह से देश में राजनीति हो रही है उसे देख कर सरकार ने एनपीए वसूली पर काफी कदम उठाये हैं। लेकिन सरकार के भीतर के लोग भी मानते हैं कि इन तमाम उपायों के बावजूद आधे से ज्यादा एनपीए की वसूली संभव नहीं होगी। फंसे कर्जे पर पिछले दिनों मुंबई में जब वित्त मंत्री जयंत सिन्हा की अगुवाई में बैंक प्रमुखों की बैठक हुई तो उसमें एनपीए वसूली की जो तस्वीर पेश की गई वह किसी भी लिहाज से उत्साहजनक नहीं कही जा सकती।

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सूत्रों के मुताबिक सरकारी बैंकों के अधिकारियों ने पुराने सारे रिकार्ड के हवाले से यह कहा है कि अभी तक जितना भी एनपीए बनता है उसका अधिकतम 40 से 50 फीसद ही वसूल किया जा सका है। जान बूझ कर कर्ज नहीं लौटाने वाले ग्राहकों से एनपीए की वसूली सबसे मुश्किल होती है। अधिकांश मामलों में 12 से 15 फीसद एनपीए की वसूली ही संभव हो पाती है। शेष राशि को बैंकों को बट्टे खाते में डालना पड़ता है। बैंकों ने एनपीए को लेकर जांच एजेंसियों की बढ़ती भूमिका और मीडिया ट्रायल को लेकर भी अपनी चिंता सरकार के सामने रखा। एक बैंक के वरिष्ठ अधिकारी ने यहां तक कहा कि उनकी स्थिति दोधारी तलवार पर चलने जैसी है। एक तरफ आर्थिक विकास दर को तेज करने के लिए उन्हें ज्यादा कर्ज देने को कहा जा रहा है जबकि दूसरी तरफ बढ़ते एनपीए की वजह से कर्ज के साथ जुड़े जोखिम को लेकर भी सावधानी बरतनी है।

बैंकों की यह चिंता इसलिए भी अहम है कि सरकार की तरफ से एक दिन पहले ही राज्य सभा में यह बताया गया है कि देश में जान बूझ कर कर्ज नहीं लौटाने वालों की संख्या पिछले तीन वर्षो में तकरीबन 40 फीसद बढ़ी है। दिसंबर, 2012 में इस श्रेणी के 5554 ग्राहक थे जिन पर 27,749 करोड़ रुपये बकाये थे लेकिन दिसंबर, 2015 में जान बूझ कर कर्ज नहीं लौटाने वाले ग्राहकों की संख्या बढ़ कर 7686 हो गई। इनके पास कुल 66,190 करोड़ रुपये की राशि फंसी हुई है।

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सरकार की तरफ से यह भी बताया गया है कि देश के शीर्ष 50 बड़े एनपीए खाताधारकों के पास 1,21,832 करोड़ रुपये की राशि फंसी हुई है। दिसंबर, 2015 तक देश के बैंकों ने कुल 26,95,132 करोड़ रुपये का कर्ज दिया है जिसका 8.30 फीसद यानी 2,23,613 करोड़ रुपये की राशि सकल एनपीए के तौर पर चिन्हित की गई है।

सिर्फ 50 फीसद एनपीए वसूली का बैंकों का तर्क सही जान पड़ता है क्योंकि कर्ज वसूली के लिए जो हथियार उन्हें दिए गए हैं वे अभी तक नाकाफी साबित हो रहे हैं। पिछले चार-पांच वर्षो से ऋण वसूली प्राधिकरणों के जरिए महज 10 फीसद एनपीए वसूल हो सका है जबकि प्रतिभूति कानून (सरफाएसी) के तहत 25 से 35 फीसद कर्ज वसूल हो सके हैं। लोक अदालतों का प्रदर्शन भी कुछ खास नहीं है।

Posted By: Sachin Bajpai

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