नई दिल्ली, सुरेंद्र प्रसाद सिंह। तात्कालिक लाभ की गुंजाइश जरूर कम है लेकिन कोरोना काल में सरकार ने कृषि क्षेत्र और किसानों को पुरानी बेडि़यों से मुक्त कर खुला आकाश दे दिया है। सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन, एपीएमसी एक्ट और एग्रीकल्चर प्रोड्यूस प्राइस एंड क्वालिटी एश्योरेंस जैसे तीन बड़े सुधारों को हरी झंडी देकर न सिर्फ अऩ्नदाता की झोली भरने की राह बना दी बल्कि बल्कि भारत को दुनिया का प्रमुख खाद्यान्न आपूर्ति का केंद्र बना सकता है। दरअसल यह ऐसा फैसला है जो चुनौती को अवसर का काल बना सकता है। 

आर्थिक पैकेज की घोषणा के क्रम में तीसरे दिन केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कृषि और उससे संबद्ध विभिन्न क्षेत्रों के इंफ्रास्ट्रक्‍चर को मजबूत करने के लिए हर संभव प्रावधान किए हैं। राहत पैकेज में कृषि क्षेत्र के साथ पशुपालन, डेयरी, मत्स्य, खाद्य प्रसंस्करण, जड़ी-बूटी, शहद उत्पादन और आपरेशन ग्रीन की कमजोर कडि़यों को सुदृढ़ करने पर जोर दिया गया है। राहत पैकेज में कृषि क्षेत्र के लिए लगभग 1.65 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की। कृषि क्षेत्र में कानूनी सुधार की लंबे समय से अटकी गाड़ी को एक झटके में पटरी पर ला दिया है। इससे किसान अब 'कभी भी और कहीं भी' अपनी उपज बेफिक्र होकर ले जाने और बेचने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा। सरकार इसके लिए एक केंद्रीय कानून लाएगी। 

अंतरराज्‍यीय कारोबार को मिली हरी झंडी

अभी तक किसान राज्यों के एग्रीकल्चरल प्रोड्यूश मार्केटिंग कमेटी एक्ट (APMC Act) के दायरे में आते थे। उसी कानून के तहत किसान अपनी उपज निश्चित मंडी के लाइसेंसधारी आढ़ती को बेचने के लिए बाध्य़ होता रहा है। कृषि उपज के अंतरराज्यीय कारोबार करने की छूट मिल गई है। जबकि इस तरह का प्रतिबंध किसी और उत्पाद पर नहीं लगाया गया है। सरकार ने किसानों को इससे मुक्त करने की घोषणा की है। कृषि क्षेत्र के लिए दूसरा कानूनी सुधार आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 में किया गया है। इस कानून की प्रतिबंधित सूची से अनाज, कृषि खाद्य सामग्री, तिलहन, खाद्य तेल, दालें, प्याज औ आलू को बाहर कर दिया गया है। इससे इस क्षेत्र में जहां निवेश बढ़ेगा वहीं किसानों को उनकी उपज का बेहतर प्रतिस्पर्धी मूल्य प्राप्त होगा। 

इन सभी कृषि जिसों पर स्टॉक सीमा को हटा दिया गया है। इस तरह की स्टॉक सीमा प्रोसेसर, वैल्यू चेन वालों पर लागू नहीं होगी। असाधाण परिस्थितियों अथवा कीमतों में 100 फीसद तक वृद्धि होने पर इसे लागू किया जा सकता है। तीसरा एक और महत्वपूर्ण सुधार की घोषणा की गई है, जिसके तहत किसानों को उसकी फसल की बोआई के समय ही उपज की अनुमानित कीमत का पता लगाने का तंत्र विकसित किया जाएगा। फिलहाल ऐसा कोई कानूनी ढांचा नहीं है। 

किसानों की निश्चित आमदनी और हितों का ध्‍यान सबसे पहले 

निश्चित आमदनी के लिए जोखिम रहित खेती में मानक युक्त गुणवत्ता वाली फसल उगाने के लिए जो उपाय किये जाएंगे, उसमें किसानों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा। इसमें किसानों से सीधे प्रोसेसर, निर्यातक, बड़े खरीददार जुड़ेंगे। कृषि क्षेत्र के इंफ्रास्ट्रक्‍चर को मजबूत बनाने के लिए एक लाख करोड़ रुपये का फंड बनेगा, जो घरेलू किसानों को आधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस करेगा। इससे खाद्यान्न के मामले में देश आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय जिंस बाजार में भी उसकी धाक जमेगी। 

कोल्‍ड स्‍टोरेज, कोल्‍ड चेन और पोस्‍ट हार्वेस्‍ट मैनेजमेंट के लिए जरूरी ढांचा बनेगा

इंफ्रास्ट्रक्‍चर विकास के तहत खेतों के पास ही पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज, कोल्ड चेन, पोस्ट हार्वेस्ट प्रबंधन के लिए जरुरी ढांचा विकसित किया जाएगा। इस क्षेत्र में आने वाले स्टार्टअप को प्रोत्साहित किया जाएगा। मांग आधारित खेती करने से खेती को लाभ का सौदा बनाया जा सकता है। वित्तमंत्री सीतारमण ने कृषि क्षेत्र की सबसे अहम कड़ी सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के विकास के लिए 10 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान का ऐलान किया है। 

लोकल उत्पाद के प्रति वोकल पर जोर

लोकल उत्पाद के प्रति वोकल होने के साथ उसे ग्लोबल बनाने के प्रधानमंत्री की घोषणा के तहत क्लस्टर आधारित विकास पर जोर दिया जाएगा। इसमें असंगठित क्षेत्र के फूड माइक्रो एंटरप्राइजेज, किसान उत्पादक संगठन, स्वयं सहायता समूहों और सहकारी संगठनों को मदद दी जाएगी। इसके तहत जिन राज्यों में जिन फसलों की अच्छी व गुणवत्ता वाली पैदावार होती है, उसे वहीं बढ़ावा देने पर बल दिया जाएगा। उत्तर प्रदेश में आम, बिहार में मखाना, कर्नाटक में टमाटर, आंध्र प्रदेश में मिर्च, महाराष्ट्र में संतरा और नार्थ ईस्ट में आर्गनिक उत्पादों की गुणवत्तायुक्त पैदावार होती है। इनकी मांग दुनिया के दूसरे देशों में भी है। कृषि क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा मछली पालन है, जिसके माध्यम से सिर्फ किसान खुशहाल नहीं होगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को नई उचांइयों पर पहुंचाना संभव है। 

मत्‍स्‍य संपदा योजना के लिए 20000 करोड़ रुपये

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत इस मद में 20 हजार करोड़ रुपये की घोषणा की गई है। इसमें इंफ्रास्ट्रक्‍चर के लिए 9000 करोड़ रुपये और समुद्री, अंतरदेशीय और एक्वाकल्चर की गतिविधियों के लिए 11000 करोड़ की घोषणा की गई है। इस क्षेत्र में 55 लाख रोजगार के अवसर पैदा होंगे, जबकि मत्स्य का निर्यात एक लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा। पशुधन को स्वस्थ रखने के लिए खुरपका मुंहपका (एफएमडी) रोग के उन्मूलन के लिए राहत पैकेज में 13000 करोड़ से अधिक की घोषणा की गई है। पशुओं के स्वस्थ होने से वैश्विक बाजार में घरेलू पशुधन उत्पादों की मांग में इजाफा होगा। 

डेयरी क्षेत्र को 15,000 करोड़ रुपये

इसके साथ डेयरी क्षेत्र को 15,000 करोड़ रुपये की सहायता की घोषणा की गई है। यह फंड डेयरी इंफ्रास्ट्रक्‍चर के बाबत खर्च किया जाएगा। कोविड-19 के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय बाजार घरेलू जड़ी बूटियों की जबर्दस्त मांग निकली है। इन संभावनाओं के मद्देनजर सरकार ने इनकी व्यवस्थित खेती करने का बंदोबस्त किया है। गंगा के किनारे-किनारे 25 लाख एकड़ रकबा में इनकी खेती को प्रोत्साहित करने के लिए 4000 करोड़ रुपये की वित्तीय मदद देने का फैसला किया गया है। इसी तर्ज पर देश में शहद उत्पादन को ब़ढ़ाकर निर्यात मांग को पूरा करने पर भी सरकार जोर देगी। इसके लिए प्राथमिक तौर प 500 करोड़ रुपये देने का फैसला किया गया है, जिसका फायदा देश के तकरीबन दो लाख किसानों को मिलेगा।

Posted By: Manish Mishra

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