'नेपाल के व्यापार को कमजोर कर रहा भारत', व्यापारियों में मची खलबली! चाय के मुद्दे पर भिड़े पड़ोसी
भारत और नेपाल के बीच चाय के आयात को लेकर तनाव बढ़ गया है, जहां भारत नेपाली चाय की गुणवत्ता ...और पढ़ें

भारत-नेपाल के बीच चाय को लेकर तनाव (सांकेतिक तस्वीर)
HighLights
भारत-नेपाल के बीच चाय आयात पर बढ़ा तनाव।
नेपाली चाय की गुणवत्ता और ब्रांडिंग पर भारत की चिंता।
दार्जिलिंग चाय के नाम पर बिक्री मुख्य विवाद।
नई दिल्ली| भारत और नेपाल के बीच पिछले कुछ दिनों से सबकुछ ठीक नहीं है। भारत और नेपाल के बीच 'लिपुलेख' का मामला तनाव का मुख्य कारण बना हुआ है। इसके अलावा अब चाय भी दो पड़ोसी देशों के बीच मामले को गर्म कर रही है। दरअसल भारत नेपाल की चाय का आयात (Import) कम कर रहा है जिसके चलते नेपाल की सरकार और व्यापारी खुश नहीं हैं।
राष्ट्रपति से हुई थी चाय इंपोर्ट रोकने की मांग
'द काठमांडू पोस्ट' में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत और नेपाल के बीच चाय का मामला कोई नई बात नहीं है। साल 2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भानु जयंती के अवसर पर दार्जिलिंग गए थे। दार्जिलिंग टी एसोसिएशन ने नेपाली चाय का आयात पर तत्काल तुरंत रोक लगाने की मांग की थी। इसके बाद से यह मुद्दा लगातार उठता रहा है।
साल 2019 में, पश्चिम बंगाल की पूर्व विधायक शांता छेत्री ने विधानसभा में भी चाय के मुद्दे को उठाया था और तर्क दिया था कि नेपाली चाय "घटिया गुणवत्ता" की है और इसका आयात तुरंत बंद कर देना चाहिए।
नेपाली चाय के लिए कड़ा नियम
नेपाल से आने वाली चाय का मुद्दा लगातार उठने के बाद 10 अप्रैल, 2024 को भारतीय अधिकारियों ने सख्त नियंत्रण लागू करना शुरू कर दिया। नेपाली चाय की गुणवत्ता का हवाला देते हुए, भारतीय सीमा शुल्क अधिकारियों ने खेप को बाजार में चाय के प्रवेश की अनुमति देने से पहले 100 प्रतिशत नमूना परीक्षण अनिवार्य कर दिया।
जून 2025 में, पश्चिम बंगाल सरकार ने प्रतिबंधों को और कड़ा करने का निर्णय लिया था। एक प्रशासनिक समीक्षा बैठक के दौरान, तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि नेपाल से आने वाली शुल्क-मुक्त चाय दार्जिलिंग चाय के ब्रांड और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने केंद्र सरकार से नेपाल-भारत व्यापार समझौते के तहत नेपाली चाय को दी गई टैक्स में छूट वापस लेने की मांग की थी।
'द काठमांडू पोस्ट' के मुताबिक भारतीय अधिकारियों का कहना है कि नेपाली चाय को नया ब्रांड नाम देकर दार्जिलिंग चाय के रूप में बेचा जा रहा है, जिससे ग्लोबल लेवल पर मान्यता प्राप्त दार्जिलिंग लेबल की प्रामाणिकता कमजोर हो रही है। ऐसे में इस पर नियम सख्त किए जाएं।
नेपाली चाय को लैब टेस्टिंग में ढील
भारत ने 1 मई से नेपाली चाय पर नए प्रतिबंध लागू किए थे। लगभग 20 दिन बाद, नई दिल्ली ने चाय आयात पर अपनी मानक संचालन प्रक्रिया में बदलाव करने और जरूरी लैब टेस्टिंग में ढील दी थी। संशोधित प्रावधान के बाद, भारत में घरेलू बिक्री के लिए इंपोर्टेड चाय के लिए अब अनिवार्य परीक्षण की जरूरत नहीं होगी। हालांकि, पुनः निर्यात के लिए रखी जाने वाली चाय का परीक्षण अभी भी किया जाएगा। साथ ही अधिकारियों के पास कभी भी जांच करने का अधिकार बरकरार रहेगा।
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भारत के वाणिज्य मंत्रालय के निर्देशों का पालन करते हुए, भारतीय चाय बोर्ड ने घरेलू भारतीय बाजार में बेची जाने वाली चाय को फिलहाल अनिवार्य परीक्षण से छूट दी गई है।
नेपाल के व्यापारियों का आरोप
नेपाल के व्यापारियों का कहना है कि भारत ने अलग-अलग बहाने बनाकर नेपाली कृषि उत्पादों, विशेषकर चाय पर बार-बार प्रतिबंध लगाए हैं। पिछले कुछ सालों में, क्वालिटी का हवाला देते हुए टेस्टिंग नियमों में, मात्रात्मक प्रतिबंधों, लेबलिंग आवश्यकताओं और जटिल कागजी प्रक्रियाओं के माध्यम से यही पैटर्न फिर से सामने आया है। चाय से साथ सबसे अधिक समस्या है। क्योंकि यह एक हाई वैल्यू वाली वस्तु है जो ब्रांडिंग और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर निर्भर करती है।
दार्जिलिंग ब्रांड है विवाद का मुख्य मुद्दा
उद्योग जगत के जानकारों ने बताया कि ये दो ब्रांड की लड़ाई है। दार्जिलिंग चाय दुनिया के प्रीमियम चाय ब्रांडों में से एक है, लेकिन इसका उत्पादन सीमित है। वर्तमान में सालाना उत्पादन केवल लगभग 6,000 से 6,500 टन है। चूंकि दार्जिलिंग चाय का उत्पादन वैश्विक मांग को पूरा नहीं कर सकता, इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेचे जाने से पहले नेपाली ऑर्थोडॉक्स चाय को अनौपचारिक रूप से दार्जिलिंग चाय में मिला दिया जाता है। यही वजह है कि चाय को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति रहती है।
