नई दिल्‍ली, जयप्रकाश रंजन। वित्त वर्ष 2020-21 में कोविड महामारी के बावजूद भारत में 81.72 अरब डालर का विदेशी निवेश (एफडीआइ) आया था। अंतरराष्ट्रीय सलाहकार कंपनी डेलाय की तरफ से मंगलवार को जारी रिपोर्ट कहती है कि वैश्विक कंपनियां भारत में निवेश के लिए पहले से ज्यादा तैयार हैं। अमेरिका व ब्रिटिश कंपनियां सिंगापुर व जापान के मुकाबले भारत को आकर्षक बाजार के तौर पर देख रही हैं। डेलाय के वैश्विक सीईओ पुनीत रंजन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार की नीतियों और देश के आर्थिक हालात के बारे में दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता जयप्रकाश रंजन से बात की। पेश हैं प्रमुख अंश..

प्रश्न: डेलाय की नई रिपोर्ट भारत की क्या तस्वीर पेश करती है?

- हमने भारत के साथ सबसे मजबूत कारोबारी रिश्ता रखने वाले चार देशों अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर व जापान के 1,200 शीर्ष बिजनेस लीडरों के बीच सर्वेक्षण के आधार पर तैयार किया है। ये मैन्यूफैक्चरिंग, सेवा, ऊर्जा, स्वास्थ्य, तकनीक, वित्तीय सेवा, रियल एस्टेट क्षेत्र की कंपनियों के प्रतिनिधि हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि भारत पांच लाख करोड़ डालर की इकोनामी बनने में सक्षम है और इसमें एफडीआइ की अहम भूमिका होगी। अमेरिका के कारोबारी समुदाय में भारत चीन, ब्राजील, वियतनाम, मेक्सिको जैसे दूसरी समकक्ष इकोनामी के मुकाबले ज्यादा प्रतिष्ठा है। अमेरिका व ब्रिटेन के कारोबारी भारत के संस्थानों की मजबूती व बेहद प्रशिक्षित श्रम शक्ति को ज्यादा पसंद करते हैं। मोटे तौर पर चारों देशों के आधे से ज्यादा कारोबारियों ने कहा है कि वे जल्द ही भारत में नया निवेश करेंगे या निवेश बढ़ाएंगे। जबकि नए निवेशकों में से दो-तिहाई ने कहा है कि वे अगले दो वर्षो में भारत में निवेश करेंगे।

प्रश्न: भारत के आंतरिक बाजार के बारे में इन वैश्विक कंपनियों की राय कैसी है?

- हमारे सर्वेक्षण में शामिल कई कंपनियों ने कहा है कि वे भारत को वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग हब के तौर पर देख रही हैं। खासतौर पर जापान की कंपनियों का कहना है कि वे भारतीय बाजार को ध्यान में रखते हुए निवेश कर रही हैं। इनकी भावी योजना भारत को एक निर्यात हब के तौर पर इस्तेमाल करने की है। भारत अभी विश्व के सबसे बड़े बाजारों में है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत को राजनीतिक व आर्थिक तौर पर स्थिर मानती हैं। हालांकि, नियामक पारदर्शिता व न्यायिक निवारण के लिहाज से वे यहां के बाजार को चुनौतीपूर्ण भी मान रही हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर की मौजूदा स्थिति भी एक बड़ी अड़चन है जिसकी तरफ संभावित निवेशकों ने इशारा किया है। अच्छी बात यह है कि भारत सरकार इस पर ध्यान दे रही है। इस वर्ष 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण में इन्फ्रास्ट्रक्चर में 1.4 लाख करोड़ डालर के निवेश की बात है जो काफी सकारात्मक है।

प्रश्न: अगले पांच वर्षों में भारत में कितना एफडीआइ आ सकता है?

- हमारे सर्वे के मुताबिक 60 फीसद निवेश नवीकरणीय ऊर्जा, वित्तीय सेवा और फाइनेंशियल टेक्नोलाजी जैसे क्षेत्रों में होगा। हेल्थ सेक्टर को लेकर काफी रुचि है। डिफेंस, टेक्सटाइल, खाद्य प्रसंस्करण भी काफी विदेशी कंपनियों को आकर्षित करेगा। भारत को पांच लाख करोड़ डालर की इकोनामी बनने में आठ लाख करोड़ डालर के सकल पूंजी निर्माण की जरूरत होगी। पिछले रुझानों के आधार पर, अगले छह से आठ वर्षो में 400 अरब डालर के एफडीआइ की आवश्यकता पड़ेगी।

प्रश्न: हाल के महीनों में सरकार की आर्थिक सुधार नीतियों ने वैश्विक माहौल बनाने में कितनी मदद की है?

- भारत सरकार की हालिया नीतियों से स्पष्ट है कि निवेश का महौल बनाने के लिए काफी कुछ किया जा रहा है। पीएलआइ देना, बीमा समेत कई सेक्टर में एफडीआइ सीमा बढ़ाना, रेट्रो टैक्स व्यवस्था को खत्म करने जैसे फैसले इसी दिशा में है। लेकिन हमारे सर्वे के अनुसार बिजनेस लीडरों में भारत में हो रहे इन सुधारों के बारे में जानकारी कम है। भारत को इन कदमों के बारे में जागरूकता फैलाने पर ज्यादा काम करना होगा।

प्रश्न: कोविड बाद के विश्व में भारतीय इकोनामी का कैसा भविष्य दिखता है?

- भारत की अर्थव्यवस्था की संभावनाओं को लेकर मैं बेहद आशावादी हूं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) का आकलन है कि सबसे तेजी से उभरने वाली इकोनामी भारत की रहेगी। वैसे, कोविड महामारी के बाद भारतीय इकोनामी के प्रदर्शन व इसकी मजबूती को देख कर वैश्विक समुदाय प्रभावित है। अमेरिकी कंपनियों के सीईओ में भारत के भविष्य को लेकर बहुत भरोसा दिखता है। कोविड के बाद सरकार की तरफ से उठाए जाने वाले कदमों से लंबे समय तक भारतीय इकोनामी की विकास दर को तेज बनाए रखने में मदद मिलेगी।

Edited By: Manish Mishra