नई दिल्ली। भारत के टॉप बॉरोअर्स के चार लाख करोड़ रुपये के कर्ज को राइटऑफ किया जा सकता है। जिन कंपनियों पर यह कर्ज है, उन्हें ज्यादा कैश फ्लो नहीं मिल रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि बीते पांच वर्षों से उन कंपनियों के नॉन-प्रॉडक्टिव एसेट्स में काफी इजाफा हुआ है। यह दावा मंगलवार को क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने एक रिपोर्ट में किया है।

देश की टॉप 500 कंपनियों के एसेट फंडिंग ट्रेंड की रेटिंग एजेंसी ने पड़ताल की है। इनमें से वे 240 कंपनियां मुश्किल में दिख रही हैं, जिन पर कुल 12.4 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। रेटिंग एजेंसी की रिपोर्ट में बताया गया है, ' इन कंपनियों को इकोनॉमिक रिकवरी से कुछ लाभ हो सकता है। हालांकि नॉन-प्रॉडक्टिव एसेट ज्यादा होने और उसकी तुलना में कमजोर कैश फ्लो के कारण इन्हें लोन चुकाने में दिक्कत होगी।'

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बैंकों को इन कंपनियों के लोन को स्कीम फॉर सस्टेनेबल स्ट्रक्चरिंग ऑफ स्ट्रेस्ड एसेट्स (ए4ए) के तहत पुनर्गठन करने में भी समस्या होगी। रेटिंग एजेंसी के अनुसार इस सूची में इंफ्रास्ट्रक्चर एंड कंस्ट्रक्शन, शुगर, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, इंजीनियरिंग एंड इक्विपमेंट, एयरलाइंस और ट्रेडिंग सेक्टर की ज्यादा कंपनियां शामिल हैं।

इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के अनुसार, 7.4 लाख करोड़ का कर्ज ऐसी कंपनियों पर है, जिनके वित्त वर्ष 2011 से 2016 के बीच नॉन-प्रॉडक्टिव एसेट्स में इजाफा हुआ है। इस कारण उनके लिए कैश फ्लो रिस्क काफी बढ़ गया है। इंडिया रेटिंग्स का मानना है कि इनमें से 26 कंपनियों का क्रेडिट प्रोफाइल बढ़ते लोन के कारण कमजोर हो सकता है। इससे इन कंपनियों के लोन के स्ट्रेस्ड कैटेगरी में जाने का रिस्क है। इसमें से अधिकांश कंपनियां रियल एस्टेट और टेलीकॉम की हैं। इन कंपनियों को बैलेंस शीट पर कर्ज का बोझ कम करने के लिए इक्विटी निवेश की मदद लेनी पड़ेगी और कैपिटल स्ट्रक्चर में बदलाव भी करना पड़ सकता है।

रेटिंग एजेंसी की माने तो, टॉप 500 की सूची में 260 ऐसी कंपनियां हैं, जिनकी प्रॉफिटेबिलिटी मजबूत है। इन कंपनियों का कैपिटल स्ट्रक्चर और एसेट क्वॉलिटी लेवल भी बेहतर दिखाई दे रहा है। रेटिंग एजेंसी के मुताबिक, 'प्राइवेट सेक्टर निवेश में रिवाइवल से इन फर्म्स का बड़ा योगदान होगा। ये कंपनियां विशेष रूप से ऑटो और ऑटोमोटिव सप्लायर, सीमेंट, केमिकल और फार्मास्युटिकल सेक्टर की हैं।'

Posted By: Surbhi Jain

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