राजीव कुमार, नई दिल्ली। चीन के खिलाफ देश में माहौल है और चीनी सामान के बहिष्कार की आवाजें उठ रही है। राजनीतिक जंग भी छिड़ी है और चीन के साथ व्यापार घाटे व मोर्चे पर चीन से साथ भिड़ंत के लिए एक दूसरे की नीतियों पर सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं। सच्चाई यह है कि पिछले डेढ़ दो दशक में व्यापार से जुड़ी दूरगामी नीति के अभाव, मैन्यूफैक्चरिंग के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं की कमी, टैरिफ पॉलिसी का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से लिंक नहीं होना, लालफीताशाही का हावी रहना, करेंसी में मजबूती और सबसे अहम बात कि चीन के साथ सामरिक स्थिरता कायम रखने के लिए व्यापारिक स्तर पर नरम रहने जैसे मुद्दों के कारण वर्ष 2005-06 से लेकर वर्ष 2013-14 के दौरान चीन से होने वाले आयात में पांच गुनी बढ़ोतरी दर्ज की गई।

वहीं चीन को होने वाले निर्यात में इन 8 सालों में सिर्फ 22 फीसद का इजाफा हो सका। 2005-06 का 10.8 अरब डॉलर का आयात 2013-14 में 51 अरब डॉलर का हो गया। लेकिन इस अवधि में निर्यात 6.7 अरब डॉलर से बढ़कर सिर्फ 11.9 अरब डॉलर तक पहुंच सका।

आंकड़ों में देखिए चीन से आयात और निर्यात का लेखाजोखा (सभी आंकड़े अरब डॉलर में)

वर्ष चीन से आयात चीन को निर्यात
2005-06 10.8 6.7
2006-07 17.4 8.3
2007-08 27.14 10.8
2008-09 32.4 9.3
2009-10 30.8 11.6
2010-11 43.4 14.1
2011-12 55.3 18.0
2012-13 52.2 13.5
2013-14 51.03 14.8

स्रोत: वाणिज्य मंत्रालय

देश की दवा बनाने वाली कंपनियां पिछले दिनों को याद करती हुई कहती हैं- काश, 15 साल पहले हमें फरमेंटेशन के लिए पर्याप्त बिजली मिल गई होती तो आज हमें यह दिन न देखना होता। फरमेंटेशन के लिए एक निश्चित तापमान को लंबे समय तक एक समान रखने की जरूरत होती है। जेनरेटर के भरोसे यह संभव नहीं था। नतीजा यह हुआ कि पिछले 15 सालों में भारत बल्क दवा के लिए 90 फीसद तक चीन पर निर्भर होता गया।

टैरिफ लिंक एफडीआइ नीति का नहीं बन पाना

व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में टैरिफ को ध्यान में रखते हुए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) नीति नहीं बनाई गई। आज तक इसका अभाव है। चीन व अन्य देशों में जिस सेक्टर में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करना होता है उस सेक्टर में टैरिफ की दर ऊंची होती है ताकि विदेशी कंपनियां आयात करने की जगह उस देश में ही जाकर निर्माण करने के लिए मजबूर हो जाए। पिछले दशक में ही अगर फोन के आयात पर टैरिफ काफी बढ़ा दी जाती तो कंपनियां पहले ही भारत में निवेश कर चुकी होती।

मैन्यूफैक्चरिंग को लेकर दूरगामी सोच वाली नीति का अभाव

वाणिज्य मंत्रालय को अंदर से लगभग एक दशक तक देखते रहे भारत के पूर्व वाणिज्य सचिव राजीव खेर के मुताबिक आयात दो स्थिति में बढ़ता है। या तो हम उत्पाद नहीं बना रहे हैं या जो बना रहे हैं वह क्षमतावान नहीं है। पिछले 10-15 सालों में इसे लेकर कोई दूरगामी सोच वाली नीति नहीं बनाई गई। भारत चीन से आयात को रोकने के लिए एंटी डंपिंग और आयात शुल्क बढ़ाने जैसी छोटी-छोटी चीजों को लेकर फंसा रहा। दूसरी तरफ चीन और वियतनाम जैसे देशों ने मैन्यूफैक्चरिंग और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए दूरदृष्टि वाले नीतिगत फैसले किए।

मैन्यूफैक्चरिंग की अनदेखी करना

विशेषज्ञों के मुताबिक वर्ष 2005 से लेकर 2012-13 तक मैन्यूफैक्चरिंग की पूरी तरह से अनदेखी की गई। यह वो जमाना था जब भारत में 100 रुपए में बनने वाले सामान चीन में 50 रुपए में मिलने लगे थे। भारतीय मैन्यूफैक्चरर्स अपनी मैन्यूफैक्चरिंग बंद कर 100 रुपए के सामान को चीन से 50 रुपए में लाना शुरू कर दिया और उसे भारत में 90 रुपए में बेचने लगा। ट्रेड प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (टीपीसीआइ) के चेयरमैन मोहित सिंगला कहते हैं, इस अवधि में मैन्यूफैक्चरर्स मैन्यूफैक्चरिंग छोड़कर अपनी फैक्ट्री को बेच प्रोपर्टी के धंधे में लग गए। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं इलेक्ट्रिकल्स उत्पादों के निर्माण पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। सरकार स्पेक्ट्रम नीलामी करके राजस्व तो कमाती रही, लेकिन मोबाइल फोन, टीवी, कंप्यूटर जैसे उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कोई नीति नहीं लाई गई।

अधिक लागत के साथ बुनियादी सुविधा का अभाव

अधिक लागत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लुधियाना से कोयंबटूर सामान मंगाने के मुकाबले चीन से सामान मंगाना ज्यादा सस्ता होता है। मैन्यूफैक्चरर्स के मुताबिक पिछले 15 सालों में चीन जहां जमीन, बिजली जैसी कारकों पर अपने मैन्यूफैक्चरर्स को भारी इंसेंटिव दे रहा था, भारत में ये दोनों चीजें उपलब्ध ही नहीं थी। मैन्यूफैक्चरर्स के मुताबिक चीन के औद्योगिक इलाके में हेलीकाप्टर उतारने की सुविधा होती है, हमारे औद्योगिक इलाके से बरसात के दिनों में कंटेनर निकालना भारी हो जाता है।

श्रम कानून भी मैन्यूफैक्चरिंग के लिए अनुकूल नहीं है। चैंबर ऑफ इंडियन माइक्रो, स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज के अध्यक्ष मुकेश मोहन गुप्ता कहते हैं, मैन्यूफैक्चरिंग के मामले में लाइसेंस राज, प्रतिकूल श्रम कानून और वैधानिक जटिलताएं इतनी अधिक रही हैं कि मैन्यूफैक्चरिंग प्रोत्साहित नहीं हो पाया।

लालफीताशाही का हावी होना

टेक्नोक्राफ्ट इंडस्ट्रीज के एमडी एवं फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशंस (फियो) के चेयरमैन शरद कुमार सराफ कहते हैं, मैं कोई चीन प्रेमी नहीं हूं। लेकिन चीन में फैक्ट्री लगाने के लिए मुझे चार घंटे में जमीन दे दी गई और तीन दिनों में फैक्ट्री का प्लान मंजूर होकर आ गया। क्या भारत में ऐसा संभव है।

सामरिक नीति का असर

पूर्व उद्योग सचिव अजय शंकर का जो कुछ मानना है वह तो पिछली सरकारों की सामरिक दुर्बलता को उजागर करता है। उन्होंने बताया कि चीन के साथ सामरिक समरसता कायम रखने के लिए भी भारत चीन के साथ आर्थिक मोर्चे पर नरम रहा है। उन्होंने बताया कि यह भारत की सोच रही है कि हम चीन के साथ व्यापार को लेकर जितना नरम होंगे, सामरिक स्तर पर चीन हमारे साथ उतना ही सामान्य रहेगा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसकी कई व्याख्या हो सकती है और विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों का जवाब भी मिल सकता है। दरअसल मोर्चे पर चीन की आक्रामकता को ऐसे कई कारणों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। शंकर के मुताबिक 2008-17 के दौरान विनिमय दर में 19 फीसद की मजबूती रही। इससे भी आयात में बढ़ोतरी हुई। 

Posted By: Manish Mishra

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