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    10 साल में गंवा दिए 22000 करोड़, कर्ज में गले तक ऐसे डूबे ये 'सिंह ब्रदर्स', इस एक गलती से शुरू हुआ बुरा दौर

    Updated: Wed, 03 Dec 2025 05:45 PM (IST)

    देश की हेल्थकेयर इंडस्ट्री में मलविंदर सिंह और शिविंदर का बड़ा नाम रहा। क्योंकि, वे दिग्गज फार्मा कंपनी रैनबैक्सी के प्रमोटर थे। लेकिन, साल 2008 में क ...और पढ़ें

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    नई दिल्ली। भारत में पिछले 10-15 सालों में कई अरबपति और उद्योगपतियों का उदय हुआ तो कुछ लोगों का पतन भी हुआ है। बर्बाद बिजनेसमैन (Bankrupt Businessmens) की इसी लिस्ट में शामिल हैं मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह का नाम..ये सरदार ब्रदर्स किसी समय कॉरपोरेट वर्ल्ड में काफी असरदार थे, लेकिन वक्त ने ऐसी चोट दी कि अब दिवालिया हो चुके हैं। मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह (Malvinder Singh and Shivinder Singh) , फार्मा कंपनी रैनबेक्सी, फोर्टिस हेल्थकेयर और रेलिगेयर इंटरप्राइजेज के मालिक रह चुके हैं।

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    भारत की हेल्थकेयर इंडस्ट्री में शिविंदर और उनके भाई मलविंदर सिंह का बड़ा नाम रहा। दरअसल, ये दोनों भाई भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी रैनबैक्सी के फाउंडर भाई मोहन सिंह के पोते हैं, दोनों भाइयों को कंपनी में 33.5% हिस्सेदारी विरासत में मिली थी। सिंह ब्रदर्स की रईसी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि किसी जमाने में फोर्ब्स की अरबपतियों की लिस्ट में दोनों भाइयों का नाम था लेकिन वक्त ने ऐसी करवट ली कि कर्ज के चलते बिजनेस साम्राज्य बर्बाद हुआ और दोनों भाइयों को जेल तक जाना पड़ा।

    पाकिस्तान से आया था परिवार

    मलविंदर और शिविंदर सिंह, भाई मोहन सिंह के पोते हैं, जो पाकिस्तान के रावलपिंडी के एक व्यापारी थे और भारत विभाजन के बाद दिल्ली में आकर बस गए थे। भाई मोहन सिंह ने अपने चचेरे भाइयों रणजीत सिंह और गुरबख्श सिंह की एक कर्ज में डूबी फर्म खरीदकर दवा कंपनी रैनबैक्सी की स्थापना की। साल 1999 में मलविंदर और शिविंदर सिंह को अपने पिता परविंदर सिंह के निधन के बाद रैनबैक्सी का कारोबार विरासत में मिला।

    कंपनी बेचते ही शुरू हुए बुरे दिन

    हालांकि, 2008 में उन्होंने कंपनी रैनबैक्सी में अपनी हिस्सेदारी जापानी फार्मा कंपनी दाइची सैंक्यो को बेच दी, उस वक्त रैनबैक्सी का कारोबार अपने चरम पर था। इस डील से दोनों भाइयों को 9,576 करोड़ रुपये का अप्रत्याशित लाभ हुआ। लेकिन, यहीं से इनके पतन की शुरुआत हो गई।

    कंपनी को बेचने के बाद मिले पैसों में से उन्होंने 2000 करोड़ रुपये कर्ज और टैक्स चुकाने में खर्च किए। वहीं, 1,700 करोड़ रुपये अपनी एनबीएफसी कंपनी रेलिगेयर में और 2200 करोड़ से ज्यादा हॉस्पिटल चेन फोर्टिस में निवेश किया। साल 2010-14 में रेलिगेयर और फोर्टिस ने अपने बिजनेस का विस्तार किया, लेकिन मंदी आने से भारी कर्ज हो गया।

    केस हारने के बाद बढ़ा कर्ज

    इस बीच साल 2012 में जापानी दवा कंपनी दाइची ने सिंगापुर के इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में दायर अपील में कहा कि सिंह ब्रदर्स ने उन्हें रैनबैक्सी डील में धोखा दिया है, क्योंकि डील के कुछ दिनों बाद ही अमेरिका ने रैनबैक्सी की दवाओं के आयात पर रोक लगाते हुए कहा था कि उनकी दवाएं गुणवत्ता वाली नहीं हैं।

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    इसे बाद कोर्ट ने दोनों भाइयों के खिलाफ फैसला दिया और दाइची को 50 करोड़ डॉलर हर्जाना देने का आदेश दिया। इसके बाद दोनों भाइयों पर कुल 13000 करोड़ की देनदारी हो गई, जिसे चुकाने के लिए उन्होंने फोर्टिस में अपनी हिस्सेदारी तक बेच दी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह कर्ज के जाल में फंसने से सिंह ब्रदर्स ने महज 10 साल में 22500 करोड़ रुपये गंवा दिए और जेल तक चले गए। इस साल अप्रल में शिविंदर मोहन सिंह ने IBC कानून के तहत नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में खुद को दिवालिया घोषित करने के लिए आवेदन दिया था।

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