जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। विश्र्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मंजूर हुए ऋण को समय पर न उठाने के चलते देश के खजाने को अरबों रुपये की चपत लग रही है। खजाने को यह नुकसान अधिकारियों की अदूरदर्शिता और सटीक योजना के अभाव के चलते हो रहा है।

हाल यह है कि बीते छह वर्षो में मंजूर हुए विदेशी ऋण की बड़ी राशि समय पर न उठाने के चलते सरकार को 600 करोड़ रुपये से अधिक राशि 'कमिटमेंट चार्ज' के रूप में चुकानी पड़ी है। अगर समय रहते लोन की इस रकम को उठा लिया जाता तो देश की इतनी बड़ी रकम बच सकती थी। विशेष बात यह है कि कई वर्षो बाद स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है और 'कमिटमेंट चार्ज' चुकाने के मामले में राजग सरकार भी पूर्ववर्ती यूपीए के ढर्रे पर ही चलती दिख रही है।

यह अहम खुलासा नियंत्रक एवं महालेख परीक्षक (सीएजी) की एक रिपोर्ट में हुआ है जो मंगलवार को लोक सभा में पेश हुई। 'सार्वजनिक ऋण प्रबंधन' पर कैग की इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने 2009-10 से 2014-15 के दौरान स्वीकृत विदेशी ऋणों (एक्सर्टनल डेट) को समय पर न लेने के चलते 602.66 करोड़ रुपये 'कमिटमेंट चार्ज' चुकाया। खास बात यह है कि बीते छह वर्षो में इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014-15 में भारत ने विदेशी एजेंसियों और अन्य स्रोतों से मंजूर हुए ऋण में से 2,10,099 करोड़ रुपये समय पर नहीं उठाए जिसके चलते देश को 110.53 करोड़ रुपये बतौर 'कमिटमेंट चार्ज' चुकाने पड़े। असल में जब कोई देश स्वीकृत लोन की राशि को समय पर नहीं उठाता है तो उसे संबंधित एजेंसी को 'कमिटमेंट चार्ज' चुकाना पड़ता है।

कैग का कहना है कि पर्याप्त योजना के अभाव और लोन की जरूरत को ध्यान में न रखने की वजह से 'कमिटमेंट चार्ज' देने की जरूरत पड़ी है। अगर लोन लेने के संबंध में योजना सही से बनायी जाती तो 'कमिटमेंट चार्ज' देने की स्थिति से बचा सकता था। कैग की यह रिपोर्ट सरकार के ऋण प्रबंधन के संबंध मंे है। रिपोर्ट मंे बताया गया है कि 31 मार्च 2015 को देश पर 51,04,675 करोड़ रुपये कर बकाया था जिसमें से 3,66,384 करोड़ रुपये विदेशी कर्ज था। हालांकि चिंताजनक बात यह है कि सरकार जो भी कर्ज ले रही है उसकी बड़ी राशि पुराने कर्ज की ब्याज और मूलधन को चुकाने में ही खर्च हो रही है।

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