नई दिल्ली [सुरेंद्र प्रसाद सिंह]। सूचना प्रौद्योगिकी में भारत के सुपर पावर बनने के साथ घरेलू बाजार में ऑनलाइन कारोबार भले ही हजारों करोड़ का हो गया हो, लेकिन तब भी ग्राहकों को ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने की सुविधा प्राप्त नहीं है। भ्रामक विज्ञापनों के मार्फत घटिया वस्तुओं की बिक्री से हर रोज ठगे जा रहे उपभोक्ताओं को बचाने के लिए सरकार की नींद अब खुली है। उसने ऑनलाइन कारोबार को विनियमित करने के लिए कानून में संशोधन का प्रारूप तैयार किया है, मगर इसके मसौदे से संसदीय समिति संतुष्ट नहीं है।

उपभोक्ता संरक्षण [संशोधन] विधेयक 2011 पर विचार कर रही संसद की स्थायी समिति मसौदे के कुछ प्रावधानों पर हैरान है। 'एक बार बेची गई वस्तु वापस नहीं ली जाएगी' के प्रावधान को संसद की स्थायी समिति ने अनुचित माना है। समिति ने बेची वस्तु की वापसी को अनिवार्य बनाने की सिफारिश की है। ऑनलाइन खरीद करने वाले उपभोक्ताओं को सामान वापस करने अथवा ऑनलाइन शिकायत करने का अधिकार नहीं है। समिति ने इस संबंध में समुचित उपाय करने को कहा है।

समिति के अध्यक्ष विलास मुत्तेवार ने कहा कि वस्तुओं पर अधिकतम खुदरा मूल्य अंकित नहीं करना उपभोक्ताओं के साथ धोखा है। वैसे, कुछ जगहों पर 'बार कोड' का प्रयोग किया जा रहा है। देश के सभी जिला उपभोक्ता फोरमों का कंप्यूटरीकरण कर दिया गया है। इसके बावजूद ऑनलाइन शिकायतें दर्ज करने की सुविधा नहीं है। यह तब है जब भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा इंटरनेट उपयोग करने वाला देश बन चुका है। जून, 2011 तक देश में 7.3 करोड़ लोग इंटरनेट का उपयोग कर रहे थे। इनमें से कुल 2.97 करोड़ लोगों ने ई-कारोबार किया।

जिला उपभोक्ता फोरमों को लेकर भी अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव है। इसके तहत जिला फोरमों को अतिरिक्त अधिकार दिए जाएंगे। ऐसा हो जाने पर जिला उपभोक्ता फोरमों को भी अपने फैसलों पर पुनर्विचार का अधिकार मिल जाएगा। राज्य और केंद्रीय उपभोक्ता आयोगों को यह अधिकार पहले से ही प्राप्त है।

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