नई दिल्ली, हरिकिशन शर्मा। विकास कार्यो के लिए जरूरी धनराशि जुटाने और अप्रासंगिक हो चुकी सरकारी कंपनियों को बंद करने की दिशा में अहम कदम उठाते हुए सरकार 57 पीएसयू से निकलने की तैयारी में है। जिन पीएसयू को निजी हाथों में सौंपा जाना है, उनकी पहचान कर नीति आयोग ने उनके नाम सरकार को सौंप दिए हैं और कैबिनेट इसमें से 26 पीएसयू को बेचने (स्ट्रेटजिक डिसइन्वेस्टमेंट) की मंजूरी भी दे चुकी है।

माना जा रहा है कि चालू वित्त वर्ष में सरकार खजाना भरने के लिए पीएसयू के निजीकरण की प्रक्रिया तेज कर सकती है। सूत्रों ने कहा कि जिन पीएसयू का स्ट्रेटजिक डिसइन्वेस्टमेंट किया जाना है, उनकी छह सूची नीति आयोग ने सरकार को सौंपी है। ताजा सूची में शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया व कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया सहित कुल 11 पीएसयू शामिल हैं।

इससे पूर्व आयोग पांच सूची सरकार को सौंप कर एयर इंडिया सहित कुल 46 पीएसयू को बेचने की सिफारिश कर चुका है जिसमें से 26 पीएसयू के स्टेटजिक डिसइन्वेस्टमेंट को हरी झंडी सरकार दे चुकी है। सूत्रों ने कहा कि लंबित आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम उठाते हुए सरकार अब निजीकरण पर जोर देगी।

हाल के वर्षो में जीएसटी का क्रियान्वयन और कॉरपोरेट टैक्स में कटौती के रूप में सरकार ने कई अहम सुधार किए हैं। ऐसी स्थिति में सरकार अब निजीकरण की दिशा में कदम उठाते हुए अप्रासंगिक हो चुके पीएसयू की पहचान करने में जुटी है ताकि इन्हें बेचा जा सके। गौरतलब है कि चालू वित्त वर्ष में सरकार ने विनिवेश के जरिये 1,05,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है जिसमें से अब तक महज 12,357.49 करोड़ रुपये जुटाए जा सके हैं। इसमें 475.89 करोड़ रुपये रेल विकास निगम लिमिटेड के आइपीओ और 1881.21 करोड़ रुपये एनिमी प्रॉपर्टी की बिक्री के जरिये जुटाए गए हैं। वहीं, 10,000.39 करोड़ रुपये सीपीएसई ईटीएफ के जरिये जुटाए गए हैं।

वित्त मंत्रलय के सूत्रों का मानना है कि स्ट्रेटजिक डिसइन्वेस्टमेंट के मोर्चे पर कई बड़ी चुनौतियां हैं। यही वजह है कि नीति आयोग की सिफारिश के बावजूद सरकार इस मोर्चे पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई है। आयोग ने अब तक जितने पीएसयू को बेचने की सिफारिश की है, उनमें से अभी तक एक भी परवान नहीं चढ़ी है।

सरकार ने पिछले वित्त वर्ष में विनिवेश के जरिये 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था जिसके मुकाबले 84,972 करोड़ रुपये खजाने में आए थे। इसमें 16,000 करोड़ रुपये स्ट्रेटजिक डिसइन्वेस्टमेंट के रूप में आए थे। इसी तरह वित्त वर्ष 2017-18 में भी सरकार विनिवेश का लक्ष्य हासिल करने में कामयाब रही थी।

सूत्रों ने कहा कि चालू वित्त वर्ष में विनिवेश का लक्ष्य हासिल करना इसलिए जरूरी है क्योंकि जीएसटी संग्रह में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पा रही है। कॉरपोरेट टैक्स में की गई बड़ी कटौती से भी सरकार के खजाने पर 1.45 लाख करोड़ रुपये का दबाव पड़ने का अनुमान है। आयुष्मान भारत और पीएम किसान जैसे कार्यक्रमों पर भारी भरकम खर्च के चलते सरकार के खजाने पर बोझ भी बढ़ रहा है।

Posted By: Pawan Jayaswal

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