नई दिल्ली, राजीव कुमार। कच्चे माल के निर्यात में भारी बढ़ोतरी से तैयार माल (फिनिश्ड गुड्स) के उत्पादन पर विपरीत असर की आशंका बढ़ रही है। खासकर एमएसएमई के उत्पादन और निर्यात में कमी आ सकती है। देश के निर्यात में एमएसएमई का योगदान 30 फीसद से अधिक है। कच्चे माल के निर्यात में भारी तेजी एवं घरेलू स्तर पर भी मांग बढ़ने से इनका दाम लगातार बढ़ रहा है, जिससे उत्पादन की लागत बढ़ गई है। लागत बढ़ने से छोटे उद्यमियों के तैयार माल महंगे होते जा रहे हैं जिससे उनकी घरेलू और विदेशी दोनों ही बिक्री प्रभावित होगी। इससे मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर कार्यक्रम पर भी असर पड़ेगा।

कारोबारियों के मुताबिक पिछले सात-आठ महीनों में सभी प्रकार के कच्चे माल की कीमतों में 50-70 फीसद तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। इनमें मुख्य रूप से स्टील, लौह अयस्क, तांबा, एल्यूमिनियम, जिंक, निकल, प्लास्टिक, रबर, काटन जैसे कच्चे माल शामिल हैं। स्टील के दाम में तो पिछले एक साल में लगभग 100 फीसद का इजाफा है। हाई रोल्ड कायल (एचआरसी) स्टील की कीमत पिछले साल जून में 35,900 रुपये प्रति टन थी जो अब 69,000 रुपये प्रति टन को पार कर गई है।

पिछले पांच-छह महीनों में इन सभी वस्तुओं के निर्यात में भारी बढ़ोतरी हुई है जिससे इन वस्तुओं के घरेलू दाम को लगातार मजबूती मिल रही है। इस वर्ष जनवरी से मई के बीच लगभग सभी कच्चे माल के निर्यात में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 60-75 फीसद तक का इजाफा है।

इंटिग्रेटेड एसोसिएशन आफ माइक्रो स्माल मीडियम इंटरप्राइजेज आफ इंडिया (आइएमएसएमईऑफइंडिया) के चेयरमैन राजीव चावला के अनुसार कच्चे माल के लगातार बढ़ रहे दाम से एमएसएमई निर्यातकों को आर्डर छोड़ने पड़ रहे हैं या उन्हें काम बीच में बंद करना पड़ रहा है। निर्यात आर्डर तीन महीने पहले लिए जाते हैं और हर पंद्रह दिनों पर कच्चे माल के दाम बढ़ रहे हैं। इससे उनकी लागत तो बढ़ जाती है, लेकिन खरीदार बढ़ी हुई कीमत पर माल लेने के लिए राजी नहीं होता है।

वहीं, गारमेंट निर्यातक ललित ठुकराल का कहना है कि काटन, यार्न जैसे कच्चे माल के निर्यात में जिस गति से बढ़ोतरी हो रही है,उस गति से गारमेंट के निर्यात में इजाफा नहीं है। जबकि आत्मनिर्भर भारत का अभियान तभी सफल होगा जब काटन और यार्न से अधिक गारमेंट निर्यात में बढ़ोतरी होगी।'

वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय के मुताबिक इस साल जून में काटन, यार्न जैसे कच्चे माल के निर्यात में 56 फीसद का इजाफा हुआ जबकि रेडीमेड गारमेंट के निर्यात में सिर्फ 24 फीसद की बढ़ोतरी रही।

छोटी कंपनियों को ज्यादा दिक्कत

छोटे मैन्यूफैक्चरर्स जब बड़ी कंपनियों के लिए जाब वर्क करती हैं तो कंपनियां उन्हें कच्चे माल की बढ़ी हुई कीमत का भुगतान कर देती है। लेकिन उन्हें अपनी तरफ से कच्चे माल की खरीदारी करनी होती है जिससे उन्हें अधिक परिचालन पूंजी की जरूरत हो रही है। छोटे उद्यमियों ने बताया कि सिर्फ कच्चे माल के दाम में भारी बढ़ोतरी से उनका टर्नओवर भी अधिक दर्ज हो रहा है। टर्नओवर बढ़ जाने से एमएसएमई की श्रेणी बदल जाती है जिससे उन्हें मिलने वाले कई प्रकार के इंसेंटिव पर फर्क पड़ सकता है।

Edited By: Ankit Kumar