नई दिल्ली, पीटीआइ। भारत जैसी एक विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए कमजोर मांग और तेल की उच्च कीमतों का परिणाम महंगाई और मंदी के रूप में आ सकता है। इसके लिए तेल की उच्च कीमतें इसलिए भी जिम्मेदार होंगी क्योंकि भारत अपनी जरूरत का करीब 70 फीसदी से अधिक तेल आयात करता है। किसी देश की अर्थव्यवस्था में जब महंगाई बढ़ रही हो, मांग घट रही हो और बेरोजगारी दर उच्च हो, तो स्टेगफ्लेशन (मुद्रास्फीतिजनित मंदी) की स्थिति आती है। जापानी वित्तीय सेवाओं के प्रमुख नोमुरा ने बढ़ती तेल कीमतों पर भारत के संबंध में यह बात कही है।

नोमुरा के अनुसार, जब सप्लाई कारणों से तेल कीमतों में बढ़ोत्तरी होती है, (जो कि वर्तमान में है) तो यह बड़े तेल आयातकों के लिए बहुत नुकसानदायक होता है। नोमुरा ने आगे कहा, "यह इसलिए होता है क्योंकि, निर्यात में कोई खासी तेजी ना आए और तेल के कारण उच्च आयात लागत हो, इससे चालू खाता स्थिति तेजी से खराब होती है। यह प्रोफिट मार्जिन को घटाती है। तेल की कीमतें बढ़ने से कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है और फलस्वरूप उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में बढ़ोत्तरी होती है।"

बीते शनिवार को सऊदी अरामको के तेल कुंओं पर ड्रोन हमले के बाद सोमवार को क्रूड ऑयल बेंचमार्क, ब्रेंट फ्यूचर्स में करीब 20 फीसद की तेजी आई है, जिससे कीमत 71.95 डॉलर प्रति बैरल (इंट्रा-डे) तक आ गई। साल 1988 में वायदा कारोबार शुरू होने के बाद ब्रेंट में डॉलर के लिहाज से यह सबसे बड़ी बढ़त थी।

नोमुरा ने यह भी कहा कि कमजोर मांग और उच्च तेल कीमतें भले ही अस्थायी हों, लेकिन ये परिणाम में मुद्रास्फीति जनित मंदी दे सकती है।

Posted By: Pawan Jayaswal

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