नई दिल्ली [जयप्रकाश रंजन]। शेयर बाजार और रुपये की रिकॉर्ड गिरावट ने सरकार के लिए साख का संकट पैदा कर दिया है। देश के कुछ प्रमुख जानकारों ने कुछ ऐसी ही राय जताई है। उनके मुताबिक, सेंसेक्स और रुपये का ताजा रुख अर्थव्यवस्था के गहरे संकट की तरफ इशारा कर रहे हैं, लेकिन सरकार उसे स्वीकार नहीं कर रही है। मौजूदा आर्थिक संकट को सीधे तौर पर वर्ष 1991 के विदेशी मुद्रा भुगतान या वर्ष 1996-97 के मौद्रिक संकट जैसा ही माना जा रहा है।

पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा का साफ तौर पर मानना है कि हालात अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम के हाथों से निकल चुके हैं। पिछले चार वर्षो से सरकार ने जिस तरह से राजनीतिक फायदे के लिए आर्थिक फैसले किए हैं, उसकी वजह से अर्थव्यवस्था वर्ष 1991 जैसी मुसीबत में फंस चुकी है। तब देश के पास महज एक अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था। आज देश के पास भले 249 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, लेकिन हमारा संकट उसी तरह का है। देश को मार्च, 2014 तक 172 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा की देनदारियों का भुगतान करना है, जबकि देश में बाहर से डॉलर आना अब लगभग बंद हो चुका है। इस राशि का इंतजाम मुश्किल है। इसका असर रुपये पर रहेगा।

वित्त मंत्रालय के पूर्व आर्थिक सलाहकार व प्रमुख अर्थशास्त्री राजीव कुमार का कहना है कि जिस दिन सरकार व रिजर्व बैंक रुपये को संभालने की कोशिश करते हैं। उसके अगले ही दिन रुपये में रिकॉर्ड गिरावट आती है या शेयर बाजार चार फीसद गिर जाता है तो यह स्पष्ट रूप से सरकार की साख पर गंभीर सवाल है। अगर हालात यूं ही रहे तो देश में डॉलर की देनदारियों के भुगतान के लिए भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष [आइएमएफ] के सामने कर्ज लेने के लिए हाथ फैलाने पड़ सकते हैं। राजीव के मुताबिक, सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि सरकार इस संकट की गंभीरता को स्वीकार नहीं कर रही। उसे स्वीकार करना चाहिए कि देश की अर्थव्यवस्था बेहद खराब दौर में है। एक तरह से आर्थिक आपातकाल की स्थिति है। इसका असर आने वाले कई ंवर्षो तक आर्थिक विकास दर पर पड़ेगा।

सिन्हा का कहना है कि अब इस सरकार से कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। यह देश हित में होगा कि संप्रग सरकार जल्द से जल्द नया चुनाव करवाए ताकि नई सरकार अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कदम उठा सके। कुमार भी मानते हैं कि अब बीमारी का इलाज करना होगा, उसके लक्षणों का नहीं।

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