यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 23, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
बिहार-आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देने में जल्दबाजी न करे केंद्र, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष ने क्यों कही ये बात
आंध्र प्रदेश का 2014 में विभाजन हुआ और उससे अलग होकर एक नया राज्य तेलंगाना बना। अब आंध्र प्रदेश का ...और पढ़ें

HighLights
- विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को केंद्र से अतिरिक्त वित्तीय मदद मिलती है।
- उन्हें केंद्र से मिली रकम खर्च करने में भी खास रियायत दी जाती है।
- भारत में फिलहाल 11 राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने रविवार को कहा कि केंद्र सरकार को आंध्र प्रदेश और बिहार की विशेष दर्जा देने की पुरानी मांग पर सावधानी से विचार करना चाहिए। उन्होंने केंद्र को सलाह दी कि उसे कोई फैसला जल्दबाजी में करना चाहिए, क्योंकि इससे एक मिसाल कायम हो सकती है। फिर बाकी राज्यों में ऐसी मांग जोर पकड़ेगी और केंद्र के वित्तीय संसाधनों से पर हद से ज्यादा जोर पड़ सकता है।
विशेष दर्जे की मांग क्यों कर रहे बिहार, आंध्र
आंध्र प्रदेश का 2014 में विभाजन हुआ और उससे अलग होकर एक नया राज्य तेलंगाना बना। अब आंध्र प्रदेश का कहना है कि इस बंटवारे में उसे राजस्व का नुकसान हुआ, क्योंकि हैदराबाद तेलंगाना की राजधानी बन गया है। इस आधार पर वह विशेष राज्य का दर्जा मांग रहा है।
वहीं, बिहार तो 2005 से विशेष दर्जे की मांग कर रहा है, जब नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने। बिहार की मांग के पीछे भी राज्य का बंटवारा ही है। 2000 में इससे अलग होकर झारखंड बना, जो खनिज समृद्ध है। इससे बिहार भी राजस्व के नुकसान की बात कहकर विशेष दर्ज की मांग करता है।
नीति आयोग के पूर्व अध्यक्ष ने क्या कहा
नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने समाचार एजेंसी को दिए इंटरव्यू में कहा, 'बिहार और आंध्र प्रदेश काफी लंबे समय से विशेष दर्जे की मांग कर रहे हैं। लेकिन, इस पर बहुत सावधानी से विचार करने की जरूरत है। आपको उन आर्थिक मानदंडों की बारीकी से जांच करनी होगी, जिसके आधार पर यह मांग की जा रही है।'
अर्थशास्त्री ने कहा, "अगर आप जल्दबाजी में विशेष राज्य का दर्जा देते हैं, तो यह एक मिसाल कायम कर सकता है। फिर कई सारे राज्य यही मांग करने लगेंगे, जिसे पूरा करना वित्तीय रूप से मुमकिन नहीं होगा।'
विशेष दर्जा वाले राज्यों को क्या मिलता है?

विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को केंद्र से अतिरिक्त वित्तीय मदद मिलती है। किसी भी सामान्य राज्य के मामले में केंद्र सरकार अपनी योजनाओं का सिर्फ 60 फीसदी खर्च उठाती है। बाकी 40 फीसदी रकम राज्य सरकार को देनी होती है। लेकिन, विशेष दर्जा वाले राज्यों के मामले में केंद्र योजना का 90 फीसदी बोझ उठाती है। राज्य को सिर्फ 10 फीसदी देना होता है।
ये राज्य अगर केंद्र से मिली रकम को एक साल में खर्च नहीं कर पाते, तो वह अगले साल के लिए कैरी फॉरवर्ड हो जाती है। लेकिन, सामान्य राज्यों के मामले में वह राशि लैप्स हो जाती है। मतलब कि उसे अगले साल के लिए नहीं ले जा सकते।
कब और क्यों हुई थी विशेष दर्जे की शुरुआत
विशेष दर्जा की शुरुआत 1969 में पांचवें वित्त आयोग की सिफारिश पर पहाड़ी इलाकों, रणनीतिक अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और आर्थिक व संरचनात्मक पिछड़ेपन वाले कुछ राज्यों को लाभ पहुंचाने के लिए की गई थी। तब असम, नगालैंड और जम्मू व कश्मीर विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था।
भारत में फिलहाल 11 राज्यों को विशेष श्रेणी के राज्य का दर्जा मिला है। इनमें मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और असम जैसे अधिकतर पूर्वोत्तर के राज्य हैं। वहीं, पहाड़ी राज्यों में उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं।
(पीटीआई से इनपुट के साथ)
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