जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट से बकाया एजीआर पर कोई राहत नहीं मिलने से देश की टेलीकॉम कंपनियों की मुश्किल तो बढ़ गई है साथ ही इसकी वजह से वाणिज्यिक बैंक भी सहम गये हैं। बैंकों का डर है कि अगर भारी वित्तीय मुसीबत से जूझ रही कुछ दूरसंचार कंपनियों पर पड़ने वाला अतिरिक्त वित्तीय बोझ उनकी स्थिति और खराब करेगी। ऐसे में ये कंपनियां पहले से बैंकों से लिए गये कर्जे को चुकाने में देरी कर सकती हैं जिससे उनके फंसे कर्जे (एनपीए) की स्थिति और बिगड़ेगी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के अगले ही दिन बैंकों की तरफ से आरबीआइ को पूरे हालात की जानकारी दी गई है।

आरबीआइ ने बैंकों को यह आश्वासन दिया है कि वह मुद्दे को सरकार के उच्च स्तर पर ले जाएगा ताकि कोई रास्ता निकाला जा सके। बैंकिंग सूत्रों के मुताबिक देश के प्रमुख बैंकों की तरफ से भारतीय बैंक संघ (आईबीए) ने पूरे हालात पर आरबीआइ को अवगत करा दिया है। यह भी बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने की स्थिति में कुछ दूरसंचार कंपनियों के समक्ष दिवालिया होने के अलावा और कोई चारा नहीं रहेगा। यह बैंकों के एनपीए के स्तर को और बढ़ा देगा।

सनद रहे कि आरबीआइ ने दिसंबर, 2019 में जारी एक रिपोर्ट में कहा था कि चालू वित्त वर्ष के दौरान कुल अग्रिम के मुकाबले एनपीए का अनुपात मौजूदा 9.2 फीसद से बढ़ कर 9.7 फीसद तक हो सकता है। अब इसके और बढ़ जाने के आसार है। बैंकों की चिंता की वजह भी यही है। दूरसंचार कंपनियों पर अभी देश के बैंकिंग सेक्टर का तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। इसमें 43 हजार करोड़ रुपये सिर्फ एसबीआइ का है। आने वाले महीनों में जब सरकार स्पेक्ट्रम की बिक्री करेगी तो बैंकों को और ज्यादा कर्ज दूरसंचार कंपनियों को देना होगा। दूसरी तरफ से सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दूरसंचार कंपनियों को बकाये राशि, जुर्माने की राशि व ब्याज तौर पर 1.47 लाख करोड़ रुपये की राशि सरकार को देनी पड़ सकती है।

दूरसंचार कंपनियों पहले से ही भारी वित्तीय मुसीबत में है। देश की तीसरी सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी कह चुकी है कि अगर सरकार से मदद नहीं मिली तो वह भारत से कारोबार बंद कर सकती है। बहरहाल, अब आरबीआइ ने इसे मुद्दे को वित्त मंत्रालय और पीएमओ के पास ले जाने की बात कही है। देखना होगा कि दूरसंचार कंपनियों को कोई राहत मिल पाती है या नहीं।

 

Posted By: Nitesh

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