26 गांवों से शुरु हुई APMC बनी एशिया की सबसे बड़ी मसाला मंडी! मोहनभाई हरिभाई पटेल की बनाई ऊंझा का जर्मनी-पुर्तगाल तक दबदबा
मोहनभाई हरिभाई पटेल द्वारा 1954 में स्थापित ऊंझा APMC, आज एशिया की सबसे बड़ी मसाला मंडी बन गई है। यह ...और पढ़ें

ऊंजा APMC का इतिहास
HighLights
मोहनभाई पटेल ने 1954 में ऊंझा APMC की स्थापना की।
यह एशिया की सबसे बड़ी जीरा और मसाला मंडी है।
जीरा, सौंफ को GI टैग मिला, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में दबदबा।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| दुनिया में मसालों के कारोबार का इतिहास बहुत पुराना रहा है। मसालों की खेती और उत्पादन के मामले में भारत शीर्ष देशों में गिना जाता है। देश के अलग-अलग राज्यों में मसालों की अलग-अलग किस्में उगाई जाती हैं। आज आपको हर रसोई की शान जीरा की विश्व विख्यात मंडी के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका नाम ऊंझा है। गुजरात के ऊंझा स्थित APMC Unjha एशिया की सबसे बड़ी मसाला मंडी है।
ऊंझा मंडी की शुरुआत कैसे हुई?
आज ऊंझा को स्पाइस सिटी कहा जाता है लेकिन शुरुआत का किस्सा बहुत दिलचस्प है। ऊंझा को एक संगठित व्यापार केंद्र के रूप में तब पहचाना गया जब भारत सरकार की ओर से साल 1954 में एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (APMC) की स्थापना की गई। ऊंझा कृषि उपज विपणन समिति (APMC) की आधिकारिक स्थापना 23 अक्टूबर 1954 को बॉम्बे एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस एक्ट 1939 के तहत की गई थी।
इसे शुरु करने का श्रेय मोहनभाई हरिभाई पटेल को जाता है, जिन्होंने किसानों को बिचौलियों के शोषण से बचाने और उनकी उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए इसकी नींव रखी थी। शुरुआत में यह मंडी केवल 26 गांवों और 28 लिस्टेड वस्तुओं के रेगुलेशन के साथ शुरू हुई थी।
मसालों की राजधानी कैसे बनी ऊंझा?
अपनी शुरुआत के बाद से ही ऊंझा मंडी ने ट्रेडिशनल फसलों को छोड़कर जीरा, सौंफ और ईसबगोल (Psyllium) जैसी नकदी फसलों के व्यापार पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित कर दिया। खुली नीलामी, पारदर्शी तौल का सिस्टम और उसी दिन नकद भुगतान की बेहतर व्यवस्था के कारण देश भर के किसान और खरीदार इस मंडी से जुड़े। उस दौर से अब तक मसालों के मामले में इस मंडी का कोई सानी नहीं।
भौगोलिक लाभ से बढ़ा व्यापारियों का दबदबा
ऊंझा मंडी गुजरात के मेहसाणा जिले में स्थित है। यह क्षेत्र मध्य प्रदेश और राजस्थान के बॉर्डर के नजदीक होने के कारण तीन राज्यों के किसानों और व्यापारियों के लिए एक प्रमुख व्यवसाय का केंद्र बन गया। स्थानीय पाटीदार (पटेल) समुदाय ने अपनी मजबूत व्यापारिक सूझबूझ और एकता से इस बाजार को एक संगठित और विश्वसनीय रूप दे दिया है। आज इस मंडी को भारत ही नहीं बल्कि एशिया की सबसे बड़ी मसाला मंडी के रूप में देखा जाता है।
जर्मनी, और पुर्तगाल तक दबदबा
दशकों के इस सफर को दुनियाभर में मशहूर करने का सबसे बड़ा मौका जुलाई 2026 में आया, जब भारत सरकार द्वारा ऊंझा के प्रसिद्ध जीरा और सौंफ को GI Tag दिया गया। इस वैश्विक मान्यता ने न सिर्फ इसके इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों (जैसे अमेरिका, जर्मनी, और पुर्तगाल) में इसकी साख को और अधिक मजबूत कर दिया है।
आज कैसा है बिजनेस मॉडल?
26 गांवों को मिलाकर शुरू हुई इस मंडी का पूरा स्वरूप बदल चुका है। इस मंडी परिसर के आसपास जीरा सफाई, सौंफ ग्राइंडिंग और ईसबगोल की 40 से ज्यादा बड़ी प्रोसेसिंग फैक्ट्रियां और मिलें चौबीसों घंटे चलती हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ऊंझा मंडी में करीब 800 बड़ी बिजनेस फर्म काम करती हैं।
कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि यहां मौजूदा समय में रोजाना औसतन 12,000 से 13,000 बोरी जीरे की आवक हो रही है। पीक सीजन (मार्च-अप्रैल) के दौरान यह आवक बढ़कर 50,000 से 1,000,000 बोरी प्रति दिन तक पहुंच जाती है। जिसके चलते ये मंडी एशिया की सबसे बड़ी जीरा मंडी के रूप में मशहूर है।
