विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

संरक्षित खेती का "यूपी मॉडल" बना मिसाल: महाराष्ट्र-कर्नाटक के बाद अब उत्तर प्रदेश बना बागवानी का नया केंद्र

Published: Fri, 20 Feb 2026 07:11 PM (IST)

उत्तर प्रदेश ने संरक्षित खेती में "यूपी मॉडल" विकसित कर बागवानी का नया केंद्र बन गया है। यह मॉडल "बनाओ ...और पढ़ें

News Article Hero Image

लखनऊ। दशकों तक उत्तर प्रदेश की कृषि की छवि गेहूं और धान के विशाल खेतों तक ही सीमित थी। यह खाद्य सुरक्षा के लिए तो आवश्यक था, लेकिन आम किसान के लिए इससे होने वाला मुनाफा अक्सर कम ही रहता था। हालांकि, अब एक शांत क्रांति जड़ जमा रही है—खुले खेतों में नहीं, बल्कि पॉलीहाउस की यूवी-संरक्षित संरचनाओं (UV-stabilised structures) के नीचे।

जहां महाराष्ट्र और कर्नाटक लंबे समय से बागवानी (Horticulture) के केंद्र रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश हाल ही में हाई-टेक खेती के क्षेत्र में एक गंभीर दावेदार के रूप में उभरा है। यह बदलाव किसी की नजरों से छिपा नहीं है; पड़ोसी राज्यों के प्रतिनिधिमंडल अब उस मॉडल का अध्ययन करने आ रहे हैं जिसे अब संरक्षित खेती का "यूपी मॉडल" कहा जा रहा है।

इस बदलाव का मुख्य कारण केवल सरकारी नीतियां या सब्सिडी नहीं है। उद्योग के जानकारों का मानना है कि यह बदलाव निष्पादन (execution) की रणनीति में आया है। अब "बनाओ और भूल जाओ" (build-and-forget) के दृष्टिकोण से हटकर "हाथ थामने" (handholding) वाले मॉडल पर जोर दिया जा रहा है, जो ढांचे (structure) के निर्माण से ज्यादा किसान के अस्तित्व और सफलता को प्राथमिकता देता है।

'घोस्ट पॉलीहाउस' की विफलता

ऐतिहासिक रूप से, भारत का संरक्षित खेती (protected cultivation) का क्षेत्र "घोस्ट पॉलीहाउस" (Ghost Polyhouses) की समस्या से जूझता रहा है। ये वे ढांचे हैं जो सरकारी सब्सिडी पाने के लिए बनाए गए, लेकिन तकनीकी जानकारी की कमी के कारण पहली फसल खराब होते ही वीरान छोड़ दिए गए।

राज्य उद्यान विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, "एग्रोनॉमी (कृषि विज्ञान) के बिना तकनीक एक बोझ है। किसान बुनियादी ढांचा तो खड़ा कर लेते थे, लेकिन उन्हें माइक्रोक क्लाइमेट (सूक्ष्म जलवायु) या पोषण प्रबंधन का ज्ञान नहीं होता था। इसलिए विफलता की दर काफी अधिक थी।"

यहीं पर यूपी की कहानी अलग मोड़ लेती है। पिछले 16 वर्षों में, स्थानीय कृषि-उद्यमियों (agri-entrepreneurs) के नेतृत्व में निजी क्षेत्र ने अलग-थलग इकाइयों के बजाय सफल खेतों के समूह (clusters) बनाने पर ध्यान केंद्रित किया है।

'क्लस्टर एप्रोच' के शिल्पकार

इस बदलाव के केंद्र में हैं अभिषेक और शशांक भट्ट। ये दो भाई हैं जिन्होंने 2011 में कॉर्पोरेट करियर छोड़कर खेती को चुना। अपनी पट्टे (lease) पर ली गई जमीन से शुरुआत करते हुए, उन्होंने एक दशक से अधिक समय एक ऐसा नेटवर्क बनाने में बिताया है, जो अब 'एग्रीफर्स्ट' (Agrifirst) – जिसे पहले 'एग्रीप्लास्ट नॉर्थ' (Agriplast North) के नाम से जाना जाता था – के बैनर तले पूरे राज्य में 400 से अधिक सफल टेक्नोलॉजी फार्मों तक फैल चुका है।

उनका दृष्टिकोण अपरंपरागत था। उन्होंने केवल ग्रीनहाउस स्ट्रक्चर बेचने वाले वेंडर के रूप में काम नहीं किया, बल्कि "खेती में भागीदार" (partners in cultivation) के रूप में काम किया, और बिक्री के बाद भी किसानों का मार्गदर्शन किया।

अभिषेक भट्ट ने कहा कि हमें शुरुआत में ही एहसास हो गया था कि अगर किसान फेल होता है, तो तकनीक को दोषी ठहराया जाता है। हमारा मॉडल सरल था: हम सिर्फ ढांचा नहीं बनाते; हम फसल बिकने तक साथ रहते हैं। हमने ऐसे क्लस्टर बनाए जहां सफल किसान नए लोगों का मार्गदर्शन कर सकें। इस सामुदायिक ज्ञान के आदान-प्रदान ने ही असली अंतर पैदा किया।

इस "हैंडहोल्डिंग" दर्शन का परिणाम यह हुआ है कि उनके नेटवर्क में पॉलीहाउस फसलों की उत्तरजीविता दर (survival rate) उद्योग के औसत से काफी अधिक है, जिसने अन्य राज्यों के कृषि बोर्डों का ध्यान भी खींचा है।

अगला चरण: स्ट्रक्चर से आगे

हालांकि, जैसे-जैसे यूपी में पॉलीहाउस की संख्या बढ़ रही है, एक नई चुनौती सामने आई है: उपज की गुणवत्ता और पोषण। जबकि किसानों ने वातावरण (स्ट्रक्चर) पर महारत हासिल कर ली है, कई अभी भी पौधों के सटीक पोषण (plant nutrition) के साथ संघर्ष कर रहे हैं—जो उच्च-मूल्य वाली उपज का मुख्य आधार है।

इस कमी को पहचानते हुए, भट्ट बंधु ने एक रणनीतिक बदलाव की शुरुआत की है। लखनऊ में हाल ही में 16 फरवरी को आयोजित हुए एक शिखर सम्मेलन में, जिसमें 150 प्रमुख हितधारक शामिल हुए, यह संगठन अब 'एग्रीफर्स्ट' (Agrifirst) – जो पहले एग्रीप्लास्ट नॉर्थ था – अपनी नई पहचान के साथ आधिकारिक रूप से सामने आया।
यह केवल नाम का बदलाव (rebranding) नहीं है; यह एक "स्ट्रक्चर कंपनी" से "एकीकृत समाधान प्रदाता" (integrated solutions provider) बनने की ओर एक मौलिक बदलाव है।

शशांक भट्ट ने कहा कि स्ट्रक्चर इस क्रांति का पहला चरण था। दूसरा चरण इस बारे में है कि पौधे के अंदर क्या जाता है। हम फसल को 'बचाने' (protecting) से आगे बढ़कर उसे 'शक्ति प्रदान करने' (powering) की ओर बढ़ रहे हैं।

स्थानीय खेतों के लिए वैश्विक विशेषज्ञता

इसे क्रियान्वित करने के लिए, 'एग्रीफर्स्ट' ने इज़राइल के हाइफा ग्रुप (Haifa Group) के साथ उत्तर भारत के कई राज्यों के लिए एक विशेष साझेदारी की है। हाइफा ग्रुप विशेष पौधों के पोषण (specialty plant nutrition) में एक वैश्विक लीडर है। यह समझौता पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है। इज़राइली कृषि तकनीक को अक्सर स्वर्ण मानक (gold standard) माना जाता है, लेकिन भारत में इसका उपयोग अक्सर टुकड़ों में ही हुआ है।

हाइफा के सटीक पोषण समाधानों को सीधे मौजूदा "यूपी मॉडल" के मेंटरशिप प्रोग्राम में एकीकृत करके, इसका उद्देश्य उन्नत कृषि अर्थव्यवस्थाओं में देखे जाने वाले उपज के स्तर को यहां दोहराना है।

एक उद्योग विश्लेषक ने कहा कि अन्य राज्यों में 'मिनी इज़राइल' हैं जो अक्सर अलग-थलग उत्कृष्टता केंद्र (centres of excellence) बनकर रह जाते हैं। यूपी जो प्रयास कर रहा है, वह है उस विशेषज्ञता का विकेंद्रीकरण करना, और एक स्थापित सपोर्ट नेटवर्क के माध्यम से विश्व स्तरीय पोषण और तकनीक को सीधे किसान के दरवाजे तक पहुंचाना।

16 फरवरी का शिखर सम्मेलन इस बदलाव का संकेत था। उनकी 'शिक्षा-प्रथम' (education-first) सोच को दर्शाते हुए, इस कार्यक्रम को दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजित किया गया था: सुबह का सत्र पूरी तरह से किसानों के तकनीकी प्रशिक्षण के लिए समर्पित था, जबकि कॉर्पोरेट घोषणाएं शाम के लिए आरक्षित थीं।

चूंकि उत्तर प्रदेश बागवानी में प्रभावशाली विकास के आंकड़े दर्ज कर रहा है, जिसकी हाल ही में विश्व बैंक ने भी इसकी लचीलेपन (resilience) के लिए प्रशंसा की है, अब सवाल यह नहीं है कि उत्तर भारत में टेक-फार्मिंग काम करती है या नहीं। सवाल यह है कि इस एकीकृत मॉडल को कितनी तेजी से देश के बाकी हिस्सों में बढ़ाया जा सकता है।

Note:- यह आर्टिकल ब्रांड डेस्क द्वारा लिखा गया है।