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पता है, अक्सर तुम याद आ जातें हों।

छोटी छोटी सी बाते

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पता है, अक्सर तुम याद आ जातें हों।

पता है,

अक्सर तुम याद जातें हों।

सौंधीसौंधी ख़ुशबूवों में,

बादलों के गुछों में,

हर फूल की नरमी में,

पहली बारिश की बूँदों में,

सरसारती हवाओं में,

स्वतंत्र उड़ते पंछियों को देखकर

पता है,

अक्सर तुम याद जातें हों।


टिमटिमाते तारों में,

नवरंग नज़ारों में,

खिलखिलाती नदियों में,

पर्वत की ऊँची चोटियाँ में,

रात की निखरी चाँदनी में,

रंग बिरेंगे फ़व्वारों को देखकर

पता है,

अक्सर तुम याद जातें हों|


किसी सोच के गलियारे में,

उर्दू के कठिन अल्फ़सो में,

अल्लाह की आयन में,

ईश्वर की इबादत में,

राग मल्हार में,

चिड़ियों की प्रेम प्रस्तुति देखकर

पता है,

अक्सर तुम याद जातें हों|


पुरानी किताबों की सिलवटो में,

और उसमें मुरझाए मोर की पंखुड़ीयों में,

वो डायरी में लिखी तुम्हारी छोटी छोटी ग़ज़लों में,

तुम्हारे टेढ़े मेड़ें चित्रकारियों में,

तुम्हारे हाँथों से लगायें पौधों में,

मेरी पर्श में रखी तुम्हारी स्टैम्प साइज़ फ़ोटो को देखकर

पता है,

अक्सर तुम याद जातें हों


अंत में एक प्रश्न छोड़े जा रहा हूँ तुम्हारे लिये……


इतना फ़ायक़ नहीं था मैं,

इतना फ़ाज़िल भी नहीं,

मैं तो पाकिज था अपने विचारों से,

फिर नासाफ़ क्यूँ हुआ तुम्हारे लिए ?

नासाफ़ क्यूँ ?

यतींद्र


फ़ायक़महान

फ़ाज़िलनिपुण

नासाफ़अपवित्र

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