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ज़िंदगी के साथ भी …ज़िंदगी के बाद भी

V2...Value and Vision

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ओ जिंदगी तुझसे बेइंतहा मोहब्बत है
क्योंकि तू ख़ुदा की खूबसूरत नेमत है

अनुपम मंच की वैचारिक दुनिया से जुड़े प्रिय साथियों
बड़ों को सादर प्रणाम ,हमउम्रों को प्यार भरा नमस्कार और छोटों को बहुत सारा प्यार और आशीर्वाद के साथ नव वर्ष की हार्दिक शुभकामना

क्या नया क्या पुराना …हिन्दी भाषा में बीते हुए समय और आने वाले समय दोनों क लिए एक ही शब्द का प्रयोग होता है “कल ” अर्थात काल ….भविष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए भूत ही आधार बनता है.ध्यान से देखें तो ‘पुराना’ शब्द का अंतिम अक्षर ‘न ‘ ही ‘नया’ शब्द का आरंभिक अक्षर ‘न ‘बन जाता है.ज़िंदगी बस इसी चक्र का नाम है ...पुराने से ही नए की उत्पत्ति संभव है ..बरसों से हमारे ज़ेहन में बसे .हमारे संस्कार ..हमारी शिक्षा ..हमारे उसूल …ही हमें आगे बढ़ने की राह और ज़िंदगी को पूरी सजगता से जीने का ज़ज़्बा और सलीका देते हैं.वर्त्तमान बीते कल और आने वाले कल के बीच सेतु का काम करता है .
बीता कल चाहे जैसा भी हो …आज और आने वाले कल को आधार अवश्य देता है.वह अच्छा रहा हो या बुरा ..अगर मानव सजग विवेकी और संवेदनशील है तो बीता हुआ पुराना ..आज और आने वाले नए को .सुन्दर से सुन्दरतर से सुन्दरतम की ओर ले जाने की अंतर्दृष्टि अवश्य देता है.

जीवन पथ पर चलने वाले प्रत्येक राहगीर की राह अलग अलग है …मंज़िल पाने का विश्वास अलग है..सबकी प्यास अलग है.. … किसी को ज़रूरतमंदों की मुस्कान के मधुमास की प्यास है ……तो..किसी को धन दौलत पद प्रतिष्ठा के मदिरा की प्यास है …. किसी के जीवन का कैनवास इतना छोटा …और ….कृतज्ञता की ऐसी संतुष्टि कि श्वेत श्याम के पेंसिल स्केच से ही निखार आ जाता है…..और …किसी के जीवन का कैनवास इतना बड़ा …और ….सजावटी रंगों की ऐसी दीवानगी कि उसके लिए कुदरत के रंग हमेशा कम ही पड़ जाते हैं….किसी को धरती के गोद से बेइन्तहां प्यार …तो …किसी को आसमान की ऊंचाईयों की अंतहीन ख्वाहिश . किसी का जीवन माटी से उठती सोंधी महक से लबरेज़ ….तो…किसी का जीवन इत्र खूशबू की सौगात के बाद भी सड़ांध से बेचैन …..किसी की ज़िंदगी में हर वक़्त शहनाई की गूंज …तो किसी की ज़िंदगी में रूदाली का शोक …. किसी के जीवन में कान्हा के वेणु की मधुरता है …तो किसी के जीवन में कौरवों से अहंकार की खटास है…किसी के जीवन में ऐसा रास कि सदियाँ लम्हों सी लगती हैं …तो किसी के जीवन में ऐसी फांस कि लम्हे सदियों से लगते हैं ….

यानि जितने जीवन ….उसे जीने के उतने ही सलीके ….उसकी सार्थकता के उतने ही पैमाने …

आप सोच रहे होंगे इस नव वर्ष में मैं इतनी दार्शनिक क्यों हो रही हूँ .मैक्सिम गोर्की की कहानी ‘एक पाठक ‘ का एक अंश याद आया ” जीवन की सार्थकता किसी लक्ष्य के लिए मानव की कोशिशों के सौंदर्य और शक्ति में निहित है और यह आवश्यक है कि उसके अस्तित्व का प्रत्येक क्षण अपने ऊंचे उद्देश्य से अनुप्राणित हो.ऐसा होना संभव है लेकिन जीवन के पुराने ढाँचे के रहते नहीं जो आत्मा को कुंठित , सीमित और उसे उसकी आज़ादी से वंचित कर देता है.”
इस वाक्य में आत्मा की आज़ादी की बात कही गई है .प्रश्न यह कि इस आज़ादी का भान कैसे हो ?यह बहुत सरल सी बात है ..जब कभी हम मानवता की गहराई को समझते हुए स्वयं को ईश्वर का अनमोल उपहार मान कर इस धरती पर एक एक लम्हे को सच्चे अर्थों में जीने लगते हैं वहीं हमारी आत्मा आज़ाद हो जाती है.
ज़िंदगी जीने का सलीका तो वही सीखाता है जो ज़िंदगी देता है बस उसकी रहमत होनी ज़रूरी है कुछ दिनों पूर्व जब एसिड अटैक पर ब्लॉग लिख रही थी ..मासूम चेहरों की विकृत अवस्था ने द्रवित कर दिया .ऐसे चेहरों के लिए स्किन ट्रांसप्लांट की सख्त ज़रुरत होती है मैंने इस बात को जाना …उनके हालात को महसूस किया .

.दोस्तों मैं किशोरावस्था से ही ग़ज़ल गीत सुनने की शौक़ीन हूँ ….विज्ञापन देखना पसंद है …अब यह शौक और पसंदगी जीवन को प्रभावित ना करे ऐसा तो कभी संभव नहीं. एक ग़ज़ल दिल के बहुत करीब महसूस हुआ …” मरने के बाद भी मेरी आँखें खुली रहे …”
और जीवन बीमा का विज्ञापन ” ज़िंदगी के साथ भी , ज़िंदगी के बाद भी ” जब इसे गहराई से कुछ आध्यात्मिक रूप में समझा तो शरीर /अंग दान की इच्छा हुई और अपने पतिदेव को इस बात की जानकारी देकर स्वयं के मृत्योपरांत अंग दाता ( ORGAN DONOR ) के लिए पंजीकृत कराया .


भारत विश्व में दूसरा सबसे अधिक जनसँख्या वाला देश है .पर अत्यंत दुःख की बात है कि यहां अंग दान की दर प्रति मिलियन जनसँख्या में सिर्फ 0.26 है जबकि उस में 26 , स्पेन में 35 प्रति मिलीं है.
मानव शरीर के अंगों का क्रय विक्रय गैर कानूनी तथा इसके लिए  Transplanting Human Organ Act 1994 के तहत सजा का प्रावधान है .यह सिर्फ दान दया जा सकता है जिसके लिए दाता को कोई रकम नहीं दी जाती है.यूँ तो जागरूकता के अभाव में अंग दान देने की इच्छा बहुत कम देखी जाती है.अंग दान में एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही यह निर्णय लेता है कि उसकी मृत्यु के बाद उसके शरीर के अंगों को किसी ज़रूरतमंद को नई ज़िंदगी देने के लिए प्रत्यारोपण के उद्देश्य से निकाला जा सके .Transplantation Of  Human Organs Act  ( THOA   ) 1994    के अनुसार ऑर्गन डोनर होने पर भी यह नज़दीकी रिश्तेदारों पर निर्भर है कि वे अंग दाता की मृत्यु के बाद उसकी इच्छा को पूरी करते हैं .यह एक्ट ब्रेन डेथ की अवधारणा को कानूनी मान्यता देता है.ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर ही रिश्तेदारों को अंग दान के मह्त्व को समझाता है.अंग कितने उपयोगी और स्वस्थ हैं यह अंग दाता के मृत्यु के वक़्त ही निर्णय हो पाता है. विशेष चिकित्सा क़ानून के तहत किसी व्यक्ति को मृत घोषित करने के लिए चार डॉक्टर्स की टीम होती है जो छह घंट के काल में दो बार ब्रेन डेथ की पुष्टि करते हैं.चार में से दो डॉक्टर सरकार द्वारा चिन्हित डॉक्टर होते हैं.रजिस्टर्ड डॉक्टर जो उस हॉस्पिटल में हो जहां ब्रेन डेथ हुआ है, न्यूरोलॉजिस्ट और अगर वह उपलब्ध न हो तो कोई भी सर्जन जो एनेस्थेटिस्ट या इन्टेंसिविस्ट हो जिसे चिकित्सा प्रशासन ने पैनल में नामित किया हो .पोस्टमॉर्टेम के वक़्त पुलिस का भी रहना आवश्यक है.बहुत रिश्तेदार इन सारी व्यवस्थाओं से ही परेशान हो जाते हैं एक तो अपनों के खोने की पीड़ा और फिर अंग दान से सम्बंधित लम्बी प्रक्रिया अतः उनके कदम इस नेक काम से पीछे हटने लगते हैं . .कुछ रिश्तेदार मान जाते हैं कुछ सामाजिक धार्मिक वज़ह और एक विशेष संवेदना के तहत डोनर की इच्छा पूरी नहीं कर पाते पर ये समस्त नियम बेहद ज़रूरी हैं ताकि अंग दान जैसे नेक इरादे की आड़ में कोई अवैध गतिविधि स्थान ना ले सके .परिवार वालों की रज़ामंदी ज़रूरी है.और अंग दान की उसकी इच्छा को पूरा करने के लिए एक बात महत्वपूर्ण यह कि डोनर के परिवार को किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता है.और अंग ग्राही  को अंग के बदले कोई पैसे नहीं देने होते .प्रत्यारोपण सर्जरी का खर्च ज़रूर वहन करना होता है.हाल ही में एक समाचार में सुना था कि अंग दान करने वाले को रेल सफर में छूट दी जाएगी पर ऐसी कोई प्रामाणिक व्यवस्था अब तक नहीं की गई है.चिकित्सा विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि एक शरीर के दान से नौ ज़िंदगियाँ बचाई जा सकती हैं.एक डोनर कार्ड दिया जाता है जिसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है यह सिर्फ इच्छा की अभिव्यक्ति है जो नज़दीकी रिश्तेदारों को डोनर की इस इच्छा से वाकिफ कराने में अहम भूमिका निभाता है.
यूँ तो अंगदान जीवन रहते और मृत्योपरांत दोनों ही स्थिति में संभव है. मृत्योपरांत अंगदान के लिए ब्रेन डेथ एक शर्त है. ब्रेन डेथ कोमा की स्थिति है .कोमा गहरी अचेतन की अवस्था है जिसमें ब्रेन सक्रिय रहता है .व्यक्ति सांस ले सकता है और व्यक्ति कोमा से बाहर आ सकता है जबकि ब्रेन डेथ में व्यक्ति के जीवित बचने की संभावना शून्य होती है. ब्रेन हैमरेज या ब्रेन इंजरी से ब्रेन काम करना बंद कर दे और मरीज को लाइफ सपोर्ट सिस्टम से ही जीवित रखा जा सकता हो.ऐसा करने पर बाकी जीवित अंगों तक रक्त प्रवाह संभव होगा और अंग सर्जरी द्वारा निकाले जा सकते हैं.सालाना १.५ लाख ब्रेन डेथ होते हैं .२ लाख किडनी ,५०,००० दिल ५०,००० लीवर की हर वर्ष ज़रुरत है.अगर ५ -१० % ब्रेन डेथ को ठीक तरह से दान कर दिया जाए तो जीवित व्यक्तियों को अंग दान देने की ज़रुरत ही ना पड़े.हर ५ मिनट में एक आदमी किडनी फेलियर से मर जाता है. कार्डियक डेथ में अंगों की भी मृत्यु हो जाती है.फिर भी कॉर्निया ,तिस्सुएस जैसे हड्डी ,त्वचा ,ब्लड स्टेम सेल ,रक्त ,प्लेटलेट्स ,टेंडॉन्स ,लिगामेंट ,हार्ट वाल्व ,कार्टिलेज दान दिए जा सकते हैं .अंग निकलने को हार्वेस्टिंग कहा जाता है .इसे अंग ग्राही को ट्रांसप्लांट किया जाता है.अंग दाता किसी भी उम्र के हो सकते हैं.आंकड़ों के अनुसार हर महीने लगभग ९०,००० मरीज के लिए अंग दान की ज़रुरत है .१००,००० मरीज किसी ना किसी एक अंग के लिए इंतज़ार कर रहे होते हैं.प्रत्येक ११ मिनटमें कोई एक इस इंतज़ार लिस्ट में शामिल हो जाता है.एक मृत दाता सभी अंग दान दे सकता है .एक जीवित डोनर किडनी ,लीवर का एक भाग फेफड़ा ,आंत का एक भाग दान दे सकता है.लीवर मानव शरीर का एक ऐसा अंग है जिसका एक भाग निकाल देने पर भी यह पुनः कुछ अंतराल में अपने सामान्य आकार में आ जाता है.किडनी के लिए यह तथ्य है कि एक किडनी के साथ भी जीवन जिया जा सकता है.
किडनी – प्रत्यारोपित किडनी नौ वर्षों तक काम करती है.यह डोनर के शरीर से निकलने के २४ घंटों के अंदर ज़रुरत मंद ग्राही  recipient के शरीर में ट्रांसप्लांट करना होता है.
लीवर और पैंक्रियास डोनर के शरीर से निकलने के १२ घंटे के अंदर , दिल और फेफड़े चूँकि सबसे संवेदनशील अंग होते हैं इन्हे चार छह घंटे के अंदर ,tissues २४ घंटे के अंदर रिसीवर के शरीर में ट्रांसप्लांट करना होता है.कॉर्निया आँख पर एक पारदर्शी कवरिंग होती है.यह किसी दुर्घटना या किसी इन्फेक्शन से उपजे आँखों के विकार में लगाई जा सकती है.७५ वर्ष के वृद्धा का भी कॉर्निया किसी युवा के कॉर्निया की तरह ही प्रभावकारी होता है दान दी गई .veins कार्डियक बाई पास सर्जरी में काम आती है.
एसिड अटैक से प्रभावित दहेज़ की मांग पर जलाई गई स्त्रियां ,सड़क या अन्य दुर्घटना के शिकारलोगों को स्किन ट्रांसप्लांट की आवश्यकता पड़ती है.मानव त्वचा सबसे बड़ा मानव अंग है .जो धूल धूप अल्ट्रा वायलेट किरणों तथा किसी भी इन्फेक्शन से शरीर के अंदरूनी अंगों को बचाता है.यूँ भी मरने के बाद त्वचा जलाई जाती है .इससे बेहतर है कि किसी ज़रुरत मंद के लिए यह दान कर दी जाए .ऑर्गन डोनर से त्वचा को लेने को अलोग्राफ्ट कहा जाता है.कम जले मरीज के ही शरीर के अन्य भाग से त्वचा ले कर उसे उसके जले हिस्सों पर प्रत्यारोपित कर सकते हैं पर ४० – ५० % जले हों तो यह संभव नहीं है .त्वचा प्रत्यारोपण के लिए पीठ , पेडू ,जांघ, पैर से ली जाती है .इसमें ४५ मिनट का वक़्त लगता है .हमारी त्वचा की ८ परतें होती हैं और इस परत का सिर्फ १/८ वां भाग ही लिया जाता है .जो अंत्येष्टि के वक़्त आते हैं उन्हें ज़रा भी फर्क पता नहीं चलता है.डोनर की न्यूतम उम्र १८ वर्ष होती है अधिकतम उम्र की कोई सीमा नहीं है.स्किन इन्फेक्शन,malignamy या स्किन कैंसर से प्रभावित व्यक्ति स्किन डोनेट नहीं कर सकते हैं.शरीर इससे विकृत नहीं होता .त्वचा पांच वर्षों तक स्किन बैंक में रखी जा सकती है .भारत में स्किन बैंक मुम्बई,चेनई,और बेंगलुरू में है.स्किन बैंक की टीम डोनर के घर /हॉस्पिटल/ में आ जाती है.एक डॉक्टर दो नर्स एक अटेंडेंट होते हैं.मृत्यु का कारण मृत्यु का सर्टिफिकेट dekhate हैं.रिश्तेदारों के कंसेंट लेते हैं.मृत के रक्त के नमूने लेकर HIV आदि जांच करते हैं किसी भी डोनर की त्वचा किसी भी ज़रुरत मंद ग्राही recipient को प्रत्यारोपित की जा सकती है .इसमें उम्र रक्त या त्वचा के रंग का मिलान करना ज़रूरी नहीं होता .

इस नव वर्ष पर किसी ज़रूरतमंद  के लिए अंग दान का संकल्प लें …ज़िंदगी के साथ भी जीवित रहे ..और …ज़िंदगी के बाद भी ….जीना इसी का नाम है.

L.IF….E

GENERATE LOVE FOR LIFE …. IF ….YOU DON’T WANT TO SEE….END OF LIFE .

(सभी सूचनाएं इंटरनेट से साभार … info@organindia.org    ORGAN India   organindiaing@gmail.com   phone  91 9650952810 )

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