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रिश्तों में जरूरी है मन का संयम

suvichar
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रिश्ता जो भी हो जैसा भी हो मन का संयम रखना और अपने रिश्तेदार को समझना बहुत जरूरी है। अक्सर देखा जाता है छोटी सी ऊंच नीच मन के गुस्से की वजह से रिश्तों में दरार आ जाती है जिसे भरने में महीनों, सालों या जीवन के खूबसूरत लम्हे गुज़र जाते हैं। रिश्ता भले ही पति-पत्नी का हो, भाई-बहन का हो, भाई-भाई का हो अक्सर अति गुस्से और आक्रोश की वजह से लोग आपस में ऐसी बाते कह जाते हैं, जो बिलकुल भी कहने योग्य नहीं होती और फिर हम बाद में पछताते हैं। बाते अपनों के बीच होती है तो उन बातो का मलाल भी अक्सर ज्यादा होता है अक्सर रिश्तो की गंभीर बातो में पछतावा उसी प्रकार होता है जिस प्रकार महाभारत के अंत में “ध्रतराष्ट्र” भीम के पुतले को नष्ट करने के बाद भावुक हो जाते हैं।

इसीलिए जरूरी है कि‍ हम आपसी रिश्तों में अपनों से या अपने रिश्तेदारों से जब भी कोई बात कहें तो  इस बात का ध्यान जरूर रखें की उसका परि‍णाम कितना प्रभावशाली हो सकता है। गर उस बात का परिणाम नकारात्मक जाता दिख रहा हो तो कोशिश करे की उस बात को बोलने से बचें। हमेशा अपने साथी या सम्बन्धी से कुछ भी बात कहने से पहले एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि‍ यह बात मायने नहीं रखती की व्यक्ति वर्तमान में कैसा है, हमेशा यह बात ध्यान में रखना होती है कि वह व्यक्ति कौन है और किन हालातों का सामना करते हुए अपने वर्तमान में पंहुचा है। अगर आप अपने साथी की इस बात को समझ जाएं  या अपने साथी को संयम रख के समझ लें तो निश्चित ही आप अपने रिश्ते की जड़ों को मजबूत बनाने में सफल रहेंगे। रिश्ते की मायने और भावनाओं को समझते हुए कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखें।

  1. अत्‍यंत ख़ुशी में कोई वादा न करें
  2. अत्‍यंत गुस्से में कोई फैसला न करें

अंततः इस लेख का सारांश यह है कि‍ जब भी रिश्तों में एक-दूसरे से बात करें तो बड़ी ही ध्यान पूर्वक करें और अगर बोलने में गलती हो जाए तो आपस में माफ़ी मांगने में और माफ़ करने में बिलकुल भी देरी ना करते हुए जीवन में आगे बढ़ जायें।

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