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ऐसी मस्जिद जहां समलैंगिक भी प्रवेश कर सकें !!

International Affairs

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सामाजिक दृष्टिकोण से इस्लाम को एक ऐसे मजहब के तौर पर देखा जाता है जो अपनी पुरानी मान्यताओं को लेकर आज भी उतना ही गंभीर है. इतना ही नहीं इस्लामिक अनुयायियों के विषय में यह भी माना जाता है कि वह समय के साथ-साथ अपनी मानसिकता को बदलने तक में दिलचस्पी नहीं रखते और जैसा होता आया है वह उस धारा से इतर कुछ भी नहीं सोच सकते. यही वजह है कि आज जहां महिलाएं भी पुरुषों की तरह पढ़-लिख रही हैं, अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं वहीं बहुत सी मुस्लिम महिलाओं पर आज भी फतवे की तलवार लटकती रहती है जिसकी वजह से वह खुलकर सांस भी नहीं ले सकतीं. इतना ही नहीं, उन पर मस्जिद जाकर नमाज पढ़ने की भी पाबंदी है.



लेकिन लंदन की एक मस्जिद ने एक ऐसी मस्जिद की स्थापना करने की शुरुआत की है जिसमें किसी भी मुसलमान के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा. फिर वह चाहे महिला हो, शिया मुसलमान हो, सुन्नी हो या फिर वह भले ही समलैंगिक ही क्यों ना हों, उन सभी के साथ समान बर्ताव और व्यवहार किया जाएगा.


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वर्ष 2012 के अंत में इंक्लूसिव मॉस्क इनिशिएटिव नामक एक ऐसे समूह का गठन किया गया जिसका उद्देश्य लंदन में रहने वाले हर मुसलमान को समान तरीके से जीवन जीने की सुविधा मुहैया करवाना था. इस समूह की ओर से एक बैठक का आयोजन किया गया जिसमें इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि वह एक ऐसे आंदोलन की शुरुआत करेंगे जिसका उद्देश्य सभी मुसलमानों के लिए मस्जिद के दरवाजों का खोला जाना है.



लेकिन जैसे ही इस आंदोलन के शुरू होने की गूंज परंपरागत मुसलमानों के कानों में पड़ी तभी से इसका विरोध शुरू हो गया है. इंक्लूसिव मॉस्क इनिशिएटिव की ब्रितानी अध्यक्ष तमसिला तौकीर कहती हैं कि वह मुसलमानों को एक ऐसी जगह उपलब्ध करवाना चाहती हैं जहां उनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव ना किया जाए. लेकिन महिलाओं और समलैंगिकों के मस्जिद में प्रवेश जैसी बातें कई लोगों के गले नहीं उतर रही हैं, उनके लिए यह आंदोलन इस्लाम के मूल आदर्शों को चुनौती दे रहा है, इसीलिए इस आंदोलन का मुखर विरोध शुरू हो गया है.


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लंदन स्थित इस्लामिक थिंक टैंक द हिट्टन इंस्टीट्यूट से जुड़े इमाम अदनान राशिद का कहना है कि इस्लाम के नियमों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी. उनका कहना है कि सच्चा मुसलमान इस्लाम की मान्यताओं के साथ खिलवाड़ नहीं करेगा और ना ही किसी प्रकार के खिलवाड़ को बर्दाश्त करेगा. उनका कहना है कि आज भी महिलाओं का गैर-पुरुष के सामने बिना पर्दे के आना सहन नहीं किया जा सकता और यही वजह है कि बहुत सी मस्जिदों में जहां महिलाओं के लिए अलग से नमाज पढ़ने या पर्दे की व्यवस्था नहीं है वहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है.



ब्रिटेन में करीब 20 लाख मुसलमान रहते हैं और इस आंदोलन ने परंपरावादी और उदारवादी मुसलमानों के बीच एक ऐसे मतभेद की शुरुआत कर दी है जिसे सुलझाया जाना तब तक संभव नहीं है जब तक कोई बीच का मार्ग ना निकल जाए या फिर मानवाधिकारों का स्तर धार्मिक परंपराओं से ऊंचा ना कर दिया जाए. जहां उदारवादियों का कहना है कि जब तक सभी लोग खुली मानसिकता से एक-दूसरे की कद्र नहीं करेंगे तब तक इस आंदोलन को सफल नहीं बनाया जा सकता वहीं दूसरी ओर इस्लामिक संस्थाओं से संबद्ध मुसलमान ऐसे किसी भी व्यवस्था को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं जो इस्लाम के मौलिक सिद्धांतों पर आघात करे. बहरहाल नतीजा क्या होगा यह तो समय ही बताएगा.



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