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चाहे न चाहे तू, आकाश यही है तेरा

स्त्री दर्पण

स्त्री दर्पण

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women empowermentऔरत हर रूप में औरत ही होती है. यहां औरत के हर रूप से अर्थ औरत के व्यक्तित्व का नहीं है. यहां औरत के रूप से तात्पर्य समाज का उसे देखने का नजरिया है. एक औरत जहां भी जाए, हर नजर में उसे विलासिता का साधन समझा जाता है. एक कमजोर कच्ची मूरत जिसे किसी भी धुरी पर घुमाकर किसी भी आकार में ढाला जा सकता है. इस पुरुष प्रधान समाज में अपने अस्तित्व के लिए लड़ती हुई कोई औरत आगे बढ़ भी जाए तो भी उसे मान देने को बड़ी मुश्किल से समाज तैयार हो पाता है. समाज के हर तबके, हर विधा में औरतें आज दबदबा भले कायम कर रही हैं लेकिन कल तक ऐसा नहीं था. कल से लेकर आज तक के इस हालात के लिए पुरुष समाज से ही कई शिखर-पुरुष औरतों के सम्मान के लिए मुखर आवाज के साथ सामने आए. राजेंद्र यादव भी उनमें से एक थे.


साहित्याकाश का बड़ा नाम राजेंद्र यादव ‘नई कहानी युग’ के निर्माता माने जाते हैं. हंस के संपादक के रूप में राजेंद्र यादव का जो दबदबा सहित्य की दुनिया में रहा वह और बात थी लेकिन इसके अलावे भी अपने जनकल्याण भाव के लिए राजेंद्र यादव हमेशा जाने गए. महिलाओं की समाज में भूमिका पर भी उनकी सोच, उनकी आवाज अक्सर विवादित रही लेकिन राजेंद्र यादव ने इसकी परवाह नहीं की. प्रेमचंद की हंस की श्रृंखला का मान आगे बढ़ाने के अलावा इन्होंने प्रेमचंद की कहानियों की खासियत महिलाओं को भी उतनी ही अहमियत दी. महिलाओं की दुविधा को बड़े बोल्ड अंदाज में पेश करते हुए राजेंद्र यादव विवादों में रहे लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की.


हमारे समाज की खायिसत कहें या इसका दोमुंहा चरित्र कि संस्कृति के नाम पर यह तमाम तरह की गतिविधियां करता है, तमाम तरह के रीति-रिवाज हैं लेकिन इनके केंद्र में हमेशा महिलाएं होती हैं. ऐसा लगता है जैसे संस्कृति की पूरी की पूरी बिरादरी महिलाओं के ही नाम कर दिया गया हो इसलिए उस संस्कृति के मान को बरकरार रखने का पूरा जिम्मा महिलाओं पर ही है. औरत का एक कदम संस्कृति को तार-तार कर सकता है. चलो यहां तक भी सही था लेकिन उसी संस्कृति को बनाए रखने का श्रेय देने की जब बात आती है तो उसका श्रेय हमेशा किसी पुरुष को ही जाता है. परिवार को जोड़े रखने का जिम्मा औरत का होता है पर खुशहाली का सारा श्रेय घर का मुखिया यानि कोई पुरुष ले जाता है. चार शादियां कर पुरुष भले चार औरतों को छोड़े, उसकी जिंदगी तबाह करे लेकिन किसी औरत ने पति के जुल्म के विरोध में अलग होने की बात भी कर ली तो चरित्रहीन करार दे दी जाती है, समाज की संस्कृति को धक्का लग जाता है. कोई यमलोक का लड़का भी अपने लिए परीलोक की सुंदरी की तलाश करने के लिए हजार लड़कियां नापसंद करे लेकिन किसी लड़की ने गलती से मां-बाप की पसंद में नुक्श निकाल दिया तो आज भी परिवार की संस्कृति को धक्का लग जाता है.

मैं नीर भरी दु:ख की बदली…

ऐसा है हमारा समाज और ऐसी है संस्कृति और संस्कारों की पेटी में बंद औरतों की कहानी. महिलाओं के साथ एक बड़ी बात उनकी यौन इच्छाओं पर न बोल सकने की या दबी-ढकी आवाज में बोलने की उनकी मजबूरी है. औरत किसी भी समाज में रहे, यहां तक कि अपने पति तक से उसे अपनी यौन इच्छाओं पर बात करने का अधिकार नहीं दिया जाता. ऐसी स्त्रियों को बदचलन, मनचली समझा जाता रहा है और आज भी कमोवेश स्थिति इससे बहुत अच्छी नहीं है.


साहित्य की विधा में महिलाओं के इन जमीनी हालात पर अब आवाज मुखर होने लगे हैं लेकिन दो दशक पहले तक यहां भी औरत घर की दहलीज में सिमटी, साड़ी में लिपटी, आदर्श बहू, त्यागमूर्ति नारी के रूप में प्रतिरूपित की जाती थी. राजेंद्र यादव ने नए युग की कहानियों की शुरुआत के साथ औरत के इस चरित्र में बदलाव के बयार को हवा देने की पूरी कोशिश की. स्त्री-पुरुष संबंधों और स्त्रियों की यौन आकांक्षाओं पर एक बोल्ड अंदाज के साथ इस आवाज को पूरी तरह मुखर हो जाने की पैरवी वे बेधड़क करते रहे. इसमें उठने वाले विवादों की परवाह भी उन्होंने कभी नहीं की. निश्चित तौर पर इस तरह के प्रयास महिलाओं की भूमिका के प्रोत्साहन में महत्वपूर्ण होते हैं. साहित्य और समाज को राजेंद्र यादव जैसी आवाज का दायरा बढ़ाने की जरूरत है.

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Rajendra Yadav Opinions About Women

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