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गुलाब

परंतप

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तुम्हारे घर से निकलती,

अर्थी को देखकर,

चेतना शून्य हो गया था ।

सोचा कहीं तुम तो नहीं इस ताबूत में,

तुम्हे तो कुछ नहीं हुआ है न ?

जिन सम्बन्धों को बरसे पहले,

पीछे छोड़ आये थे हम,

अपने परिवारों के कहने पर ।

उनकी स्मृतियों की गाँठ,

खुल गई है ,

वे आज फिर संदूक से निकल कर,

खिडकियों से दुनिया को झाँक रही हैं ।

और अब आज तुम भी नहीं रहे-

इस दुनिया में ,

यह कैसा वादा निभाया तुमने ?

दूर से ही सही तुम्हे देख लिया करता था,

तुम उत्तर में मुस्कुरा दिया करती थी ।

सपने अपने नहीं हुए तो क्या,

हमने साथ मिलकर देखा तो था ।

 

देर रात हो चली थी,

तुम्हारे कब्र से घंटों बाते करता रहा था ।

जानता हूँ अब तुम उत्तर न दे सकोगी,

तुम्हारी बेबस उदासी को महसूस कर सकता हूँ ।

तुम्हे याद है न मैं तुम्हे ‘गुलाब’ कहकर बुलया करता था

इसलिए आज गुलाब के ही फूल लेकर आया हूँ,

तुम्हे भेंट करने के लिए ।

दफनाते समय हिम्मत न हो सकी की आकर,

अपने हिस्से की मिट्टी डाल सकूँ,

तुम्हारी कब्र पर ।

सुबह होने को थी,

कब्र के पास की थोड़ी मिट्टी ले आया था,

गमले में डालकर गुलाब का पौधा.

लगा दिया था ।

अब फूल बनकर तुम,

रहती हो मेरे आस-पास

बहती हवाओं में जानी पहचानी,

खुसबू से,

हमारे सम्बन्ध बोलते हैं,

स्मृतियों के द्वार खोलते हैं ।

प्यार से तुम्हारा निमन्त्रण,

उस पार आने का,

मुझे है सहर्ष स्वीकार ।

जहाँ न हो ये संसार,

न ही इसके खोखले बंधन,

न ही किसी की जीत न हार,

शीघ्र होगा एकाकार ।

मैं और मेरे गुलाब,

हम फिर एक साथ खिलेंगे,

प्रेम की धरती पर,

मानवता को सुरभित करने..

———-परंतप मिश्र

 

 

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