Menu
blogid : 27968 postid : 128

अव्यक्त गीत

परंतप

परंतप

  • 20 Posts
  • 2 Comments

 

ऐसा क्यों होता है कि

तुम कुछ कह न सके और मैं

तुम्हारे शब्दों को तलाशता रहा,

तुम कुछ सुन न सके और मैं

प्रतिपल तुम्हे पुकारता रहा।

 

तुम कुछ देख न सके और मैं

सुंदर सपनों को सजाता रहा

तुम कुछ महसूस न सके और मैं

दर्द से हमेशा मुस्कुराता रहा।

 

तुम एक पत्र को न समझ सके और मैं

पातियों पर पातियाँ भेजता रहा,

तुम कोई गीत न गा सके और मैं

कविताओं की रचना करता गया।

 

तुम मित्र न बन सके और मैं

चिर मित्र की कल्पना कर बैठा,

तुम कवितायेँ न समझ सके और मैं

अक्षरों को शब्दों में पिरोता गया।

 

तुम आँखों में झाँक न सके और मैं

आंसुओं को छुपाता रहा,

तुम संगीत न समझ सके और मैं

ह्रदय ताल से गुनगुनाता रहा,

तुम कभी मिल न सके और मैं

तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहा।

-परन्तप मिश्र

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

Read Comments

Post a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *