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आलोचना के बदलते मानदंड

समसामयिक / करेंट अफेयर्स लेख...contemporary /current issue

समसामयिक / करेंट अफेयर्स लेख...contemporary /current issue

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विषय पंक्ति कबीरदास के दोहे- ‘ निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाये ,..बिन पानी, साबुन बिना निर्मल करे सुभाय ‘ से उद्धरित है , जिसमें कबीरदास निंदक या आलोचक को मानव के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान देते है ,और कहते है कि जिस प्रकार पानी व साबुन से व्यक्ति का तन विशुद्ध किया जा सकता है ,उसी प्रकार मन की शुद्धि हेतु सच्चे आलोचक का निकट जीवन में होगा अति आवश्यक है। सामान्यत: व्यक्ति को निंदा अच्छी नहीं लगती , क्योंकि हर व्यक्ति को अपने गुणों पर स्वाभिमान होता है ,जो कि सही भी है लेकिन जब यह स्वाभिमान व्यक्ति में दोषों,कमजोरियों,दुर्बलताओं, तथा गलतियों की अवहेलना करते हुए छद्म रूप में इन्हें सद्गुणों के रूप में रेखांकित करे तो व्यक्ति के व्यक्तित्व में अहं, अभिमान ,छद्म सर्वगुणसंपन्नता तथा असफलता आदि का मार्ग प्रशस्त करता है। यदि आलोचना परिपक्व सोच, सच्चे मन से ,सकारात्मक ,सार्थक व नि:स्वार्थ उद्देश्य के साथ,पूर्वाग्रह रहित तथा तार्किक हो तो अवश्य इसके सुधारात्मक परिणाम व्यक्ति के व्यक्तित्व में सफलता,सद्गुण, सामर्थ्य ,परिपक्वता व चहुँमुखी विकास के रूप में झलकते है । दूसरी और आलोचना करने के यदि साधन व साध्य अपवित्र हो अथार्त निंदा द्वैष,ईर्ष्या ,प्रतिशोध तथा नकारात्मकता के भाव से हो तो इसके परिणामस्वरूप पैदा नकारात्मक उर्जा तथा निराशा व्यक्ति के विकास में बडी अवरोधक बनती है ।आलोचना व्यक्तिगत,सामूहिक,सामाजिक ,वैचारिक तथा राष्ट्रीय स्तर की हो सकती है लेकिन यह सापेक्षिक तथा मर्यादित आचरण में करने पर ही उत्पादक व सृजनात्मक सिद्ध होती है । व्यक्तिगत निंदा यदि अच्छे उद्देश्य से हो तो वह व्यक्ति के दोषों को दूर करने,तथा व्यक्तित्व निखारने में सहायक सिद्ध होती है , प्राचीन समय में सद्भाव से रत्नाकर नामक डाकू के कुकृत्यों की नारद मुनि द्वारा तार्किक आलोचना ने रामायण रचियता आदि वाल्मीकी को जन्म दिया। वैसे व्यक्तिगत आलोचना सच्ची व तार्किक , हमारे जीवन को अधिक निकटता से जानने वाले यथा: माता-पिता, परिवारजन,गुरूजन तथा मित्र समूह अधिक सुचिता से कर सकते है। अध्यापक भी विषय विशेष के बारे में हमारी कमजोरियों की आलोचना कर, हमारे अंदर उस विषय की गहरी समझ विकसित करने की सार्थक पहल करते है । वही दूसरी और ऐसे आलोचक आज अधिक हो गये जो किसी व्यक्ति के गुण-दोष को निकटता से जानते ही नहीं या जिस विषय पर स्वयं ही अनभिज्ञ है पर मूल्यांकन या आलोचना में सबसे आगे रहकर अपने -आप को विद्वान प्रदर्शित करने में लगे रहते है ऐसे में रचनात्मक निंदा की आशा नहीं की जा सकती । भारतीय संविधान व्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अभिव्यक्ति की आजादी मूल अधिकार के रूप में सुनिश्चित करता है लेकिन युक्ति -युक्त निर्बंधन के साथ, यानि कोई व्यक्ति किसी अन्य की आलोचना /निंदा ऐसे नहीं कर सकता जिससे की अगले व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचे और उसकी छवि धूमिल हो , लेकिन बढते मानहानि के केस आलोचकों द्वारा स्वहित के लिए इस लक्ष्मण रेखा को पार करने का परिणाम है। समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों,अंधविश्वासों ,आडम्बरों ,कुप्रथाओं तथा भेदभावों आदि की तटस्थता, धर्मनिरपेक्षता तथा रचनात्मक सुझाव से युक्त आलोचना ही समाज में सकारात्मक परिवर्तन की सारथी बनती है। समाज में व्याप्त बुराईयाँ की तार्किकता की कसौटी पर निंदा की गोद में ही पुनर्जागरण आंदोलन फलीभूत होते है , वर्तमान में महिला, व दलित भेदभाव तथा मुस्लिम पर्सनल लॉ के विभेदनकारी प्रावधानों की व्यवहारिक आलोचना प्रखर है , इसलिए भविष्य में इसकी परिणती समाज सुधार की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी । वही भारतीय लोकतंत्र के पवित्र मंदिर संसद में हर कानून के निर्माण से पहले विचार-विमर्श होता है हर कानूनी प्रारूप के गुण -दोषों को पक्ष-विपक्ष द्वारा जांचा -परखा जाता है तथा जरूरत होने पर आलोचना भी की जाती है ताकि उसमें सुधार किया जा सके । संसदीय प्रणाली में यदि किसी कानून की आलोचना , जनता के समग्र हितों को ध्यान रखकर की जाती है तो उसके परिणाम सदैव देशहित व जनहित में होते है , वही यदि आलोचना राष्ट्र हित के उपर पार्टी हित को महत्व देकर तथा अतार्किक विरोध के लिए की जाती है तो उसके दुष्प्रभाव देशव्यापी होते है और यह लोकतंत्र की मूल भावना के भी प्रतिकूल है। साथ ही किसी भी विचारधारा से व्यक्ति सहमत-असहमत हो सकते है तथा उसके प्रशंसक-आलोचक भी हो सकते है लेकिन जब तक उस विचारधारा की प्रशंसा व आलोचना प्रभावी तर्क, सत्यता तथा व्यवहारिकता के स्तंभ पर नहीं होती तब तक उसके विकासात्मक परिणाम प्राप्त नहीं होते। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया को भारतीय परिदृश्य में इवेल्यूएट करे तो हम भारतीय मीडिया को pro- वामपंथी &pro-दक्षिणपंथी ,कांग्रेस समर्थक तथा भाजपा समर्थक के रूप विभाजित पाते है जो किसी स्वस्थ्य लोकतंत्र की बुनियाद कतई नहीं हो सकता , कांग्रेस समर्थक मीडिया कभी भी भाजपा /एनडीए सरकार की नीतियों को तटस्थता तथा पूर्वाग्रह रहित आलोचना /मूल्यांकन नहीं कर सकता ,वैसा ही व्यवहार भाजपा समर्थक मीडिया दोहराता है । इस प्रकार विभाजित मीडिया आलोचना करते व्यक्त पार्टियों के हित व स्वार्थ के आगे राष्ट्र हित में सार्थक संवाद कायम नहीं कर पाते । हम जानते है कि व्यक्ति स्वयं के गुण-दोषों को जितना गहराई से जानता है उतना अन्य व्यक्ति नहीं जानता इसलिए यदि व्यक्ति आत्म-आलोचना ,आत्म-अन्वेषण तथा प्रगतिशील सोच से खुद की कमजोरियों को रेखांकित कर उसे दूर करने का प्रयास करे तो अवश्य उसमें गुणात्मक व सार्थक बदलाव आ सकते है। कबीरदास ने कहा कि हम जिस दिन स्वयं के निंदक बनकर व्याप्त कमियाँ को खोजकर दूर करना सीख जायेंगे ,उस दिन से हम दूसरों की भी सार्थक व बदले की भावना से रहित आलोचना कर पायेंगे……..” बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोये। जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोये॥…….निष्कर्षत: – यदि व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की बिना किसी द्वेष,ईर्ष्या तथा लाग-लपेट के आलोचना /निंदा करता है ,तो इसके सकारात्मक परिणाम व्यक्ति ,समाज तथा राष्ट्र ,सभी के हितों के अनूकुल होते है , इसलिए व्यक्ति को झूठे प्रशंसक को निकट रखने के बजाय , सच्चे निंदक को हमेशा निकट रखना चाहिए क्योंकि सच्चा निंदक ही सही मायने में हमारा हितकारी है। साथ ही व्यक्ति को स्व-अवलोकन को महत्व देते हुए ‘ आत्मदीपो भव:’ की उक्ति को चरितार्थ करने के प्रयास करने चाहिए।।
:-लेखक- विशनाराम माली मोकलपुर

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