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सिर्फ एक दिन क्यूँ ?

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वेलेंनटाईंन डे ( १४ फ़रवरी ) हर साल बड़े धूमधाम से मनाया जाता है , मेरी समझ में आज तक यह नहीं आया की आखिर साल के ३६५ दिनों में सिर्फ एक दिन ही प्यार करने का क्या तुक है , और बाकी के ३६४ दिन किस लिए बनाये गए हैं , क्या रोने और कलपने के लिए .जिस किसी ने भी इस विचार को मान्यता दी या प्रचारित किया .क्या यह सही है ?

कहा जाता क़ि रोम में संत वेलेंटाइन नाम के एक पुजारी थे , जो 269 ई. के बारे में एक प्रेम प्रकरण के सिलसिले में शहीद हो गये थे और वाया फ्लेमिनिया पर दफनाये गये थे उनके अवशेष रोम में सेंट Praxed के चर्च और Whitefriar डबलिन, आयरलैंड में स्ट्रीट कामिलैट चर्च में रखे गए हैं.इन्हीं के नाम प़र वैलेंटाइन्स दिवस १४ फरवरी को हर साल मनाया जाता है।ऐसा एक ऐतिहासिक तथ्य है , बिना विस्तार अथवा इसकी सत्यता में गए , शायद संत वेलेंटाइन की जेलर की अंधी लड़की से प्रेम की यादगार में लोग उनकी याद में इस दिन को प्रेम दिवस के रूप में मनाते चले आ रहे हैं .
हो सकता है कि संत वेलेंटाइन कि यादगार में यह परंपरा चल पड़ी हो परन्तु भारत जैसे देश में जहाँ प्रेम और स्नेह ही जीवन का आधार हो , वंहा किसी एक दिन को ” प्रेम दिवस ” का रूप दे देना न केवल गलत परिपाटी का अनुसरण करना है बल्कि भारतीय मूल्यों का अवमूल्यन करना भी है

प्रेम , स्नेह , करुणा भारतीय समाज में सर्वप्रिय है और पुरातन कल से इसे भारतियों ने आत्मसात कर रखा है . मां , बहन ,पिता , भाई, पति सभी अपनों को बिना किसी स्वार्थ के प्रेम देते है , औए यह प्रक्रिया हर पल निर्बाध भाव से चलती रहती है , इसे किसी एक दिन विशेष के लिए बांध देना कतई अनुचित है .
बिना प्रेम के तो जीवन ही बेकार और नीरस हो जायेगा .
इस लिए भारतीय परिप्रेक्ष्य में जहाँ जीवन का सार ही प्रेम हो , वंहा साल के ३६५ दिनों में से सिर्फ एक दिन १४ फ़रवरी को प्रेम दिवस का नाम देना सिवाय अन्धानुकरण के अलावा और कुछ नहीं है.

इस लिए पूरे साल , हर पल प्रेम , स्नेह को एक दूसरे से साझा कीजिये , और भारतीय संस्कृति के अनुसार अपने माता , पिता , भाई बहन और बजुर्गों को प्यार दीजिये और लीजिये .

प्यार का मतलब सिर्फ प्रेमी – प्रेमिका के बीच का प्यार नहीं है , इसे सर्वंगीण और समग्र रूप से देखे जाने की ज़रूरत है .

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