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माँ

साहित्य और मै
साहित्य और मै
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माँ मैंने देखा है तुम्हारी आँखों में
कुछ करूणा-प्रेम के कणों को,
तुम्हारे बंटे हुए व्यक्तित्व को
जब तुम जानती हो सब,
मगर अनजान बनने की कोशिश में
रत रहती हो,
अपनी परिधि में घिर कर
ममता की छाया में
मुझे चिपटी हो ऐसे
कि मनो सम्पूर्ण संसार की बुराइयों से
बचा ही लोगी,
और मेरे हिस्से का दर्द भी
अपनी सीने में भर लोगी!
तुम मेरी माँ हो
तुमने मुझे यह संसार दिया है
मेरे आँचल में खुशियाँ भर देने का
स्वप्न देखा है,
तुम लुटा देना चाहती हो
भू-मण्डल अपने नैनतारों पर
परन्तु
मनुष्य एवं प्रकृति
माँ तो नहीं है |
वह कैसे सुख समझे
अपनी माँ की
आँखों के तारों का |

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