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मसरुफ़ियत

साहित्य और मै
साहित्य और मै
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मैं मसरूफ़ हूँ तेरी यादों में,
जो हर लम्हा चली आती हैं,
बुलाए बगैर |
अपनी यादों को तुम रख करो
अपने ही साथ
ये सादगी से शरारत कर जाती हैं |
तुमने मिलने की कवायद हुई साडी बेजा
अब तो यादें ही बेजार कर जाती हैं
भरी महफिल में घेर लेती हैं |
अपनों में भी तनहा कर जाती हैं
पूछे कोई क्यों हँसते हो रोते में
रोते-रोते हुए क्यों हंस देते हो ?
नाम किसका लें, ये करम किसका है
अपना बना के जो हलाल कर जाते हैं
तुम ही कह दो क्या कहे “वंदना”
अब तो बदनामी भी मेरे दर पे चली आती है |

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