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दुनियादारी

साहित्य और मै
साहित्य और मै
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देखकर दुनियादारी और रिश्तों का व्यापार,
मेरे अन्दर का मासूम बच्चा
सहम कर
दुबका है भीतर अँधेरे कोने में
बेतहाशा रोहा चाहता है तुझसे लिपटकर
छिपा ले मुझे आँचल में |
अम्माँ ! हर चेहरे पर मुखौटे
हर मुखौटे में नया चेहरा यहाँ
कैसे पहचानूँ?
मिली थी कल जिससे – वाही शख्स होगा मेरे साथ यहाँ?
रिश्तों में व्यापार और
व्यापारी रिश्ते
समझना मुश्किल बहुत दुनियादारी |
हँस कर मिलने वाले कैसे हमदम –
करेंगे वार पीछे से
सरकाएँगे ज़मीन पैरों की
मरेंगे खंजर सीने में
गिरती मेरे लहू की बूंदों से
कर लेने तृप्त मन अपना |
अम्माँ | मन मेरा भोला पसोपेश में है |
तुम्ही कहती थीं, ‘हम सब एक हैं’
यहाँ कोई भी नहीं मेरा |
अगर यही है दुनियादारी
तो क्यों लाई मुझे दुनिया में
और क्यों खिलाई मैंने फुलवारी ?

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