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कामवाली

साहित्य और मै
साहित्य और मै
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चाय के प्याले माँजते
हाथ तेज़ चलती हूँ मगर
दिमाग उससे भी तेज़ दौड़ता है
मुँह अँधेरे उठ
घर का काम निपटा
दौड़ती-हाँफती घरों का काम करने
पहुँच तो जाती हूँ ‘टेम पर’
फिर भी हर दिन ‘लेट हो जाती हूँ’
दो घर और बाकि है
दोपहर बाद
फिर यही सात घर, दोबारा
टूटी साइकिल पर पैडल मरती
पगार का हिसाब लगाती हूँ
एक छुट्टी की माफी मिल जाएगी
दूसरी छुट्टी, कहीं काम ही ना छुड़वा दे
इस बार ‘मेम साहब’ से
नई साड़ी मांगूंगी
‘नई साड़ी’ जो पुराणी हो होती है
फटे कपडे पहनती हूँ
शायद उन्हें तरस आएगा ही
‘खटाक’
प्याला हाथ से फिसल नीचे गिरा
साड़ी तो नहीं मिलनी थी
पगार का बीस रूपया भी कट गया |

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