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ईश प्रार्थना

साहित्य और मै
साहित्य और मै
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विचारों एवं आशाओं के
आसमान से घेर कर
आत्ममंथन और सांस्कृतिक उत्थान का
आँचल ओठ
ढाँप लूँ स्वयं को
सांस्कृतिक विरासत के गर्जन में
ज्ञान-विज्ञान एवं उपासना की फुहार में
आत्मा, शरीर एवं विचारों को लथपथ कर
आनन्द मनाने की
एक ही तो चाह है
कि हे प्रभु, तू मुझे स्वीकार कर ले |
इतने बड़े विश्व में
चल-अचल प्राणियों में
आजतक में अकेली हे खड़ी हूँ
प्रेम का सन्देश ले
शांति की पता का थामे
गिर उठकर भी लगातार आगे बढ़ रही हूँ
सतत विश्वास की ज्वाला जगाए
कि तू मुझे स्वीकार कर ले
हे प्रभु, तू मुझे स्वीकार कर ले ||

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