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अमर कृति

साहित्य और मै
साहित्य और मै
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कलाकार हैं दोनों
तुम भी और मैं भी
तुम कागज पर
आड़ी-तिरछी रेखाओं को
सीमाओं में बाँध
सहेज कर
कोमलता का स्पर्श दे
आकृतियों का आकर प्रदान करते हो,
उन्हीं रेखाओं को
मैं
शब्दों में बाँध
कला को जन्म देती हूँ
वे चित्र जो मौन हैं
परन्तु
अपने भीतर चित्रित आकृतियों की
आवाज़ का आभास देते
कोहराम मचाते हुए
अपने जीवित होने का विश्वास जगाते हैं
वे चित्र अमर हैं
जो तुम्हारी सधी हुई कलम से
कागज पर बने हैं |
कुछ शब्दों को
एक साथ रख
विचारों में पिरो
मैंने जो आकर दिया उसे रचना का
उसके शब्दों की गर्मी
यदि तुममे कुछ पलों की ही
चेतना जगा सकी,
तब मैं समझूँगी
कि
तुम अपनी धारणाओं से बहार निकल
सम्मानित कर सकोगे
उन आड़ी-तिरछी रेखाओं से बने
शब्दों को
जिनमे रह-रह कर
उबाल उठता है |
और तब मैं भी हो जाऊँ शायद
तुम्हारे चित्रों कि भाँति
अमर कृति |

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