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योग, आयुर्वेद और कोरोना वायरस

WHO WE ARE

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कोरोना महामारी के कारण बीते वर्ष ने हम सभी का परिचय कुछ नए तो कुछ कम प्रचलित शब्दों से करवाया. मार्च 2020 से लेकर अब तक इन शब्दों में कई ऐसे शब्द हैं जिनका उपयोग प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समेत हम सभी लगभग रोज ही करते चले आ रहे हैं जैसे कि मास्क, दो गज की दूरी, क्वारेंटीन, महामारी, शारीरिक दूरी, आइसोलेशन, लॉक डाउन, सेनिटाईजेशन, पेनाडेमिक, कन्टेनमेंट जोन, आरटी-पीसीआर (रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पॉलीमर्स चेन रिएक्शन) टेस्टिंग, ट्रीटमेंट आदि. यहाँ तक कि पहले सिर्फ कर्फ्यू हुआ करता था लेकिन इस महामारी ने कोरोना कर्फ्यू, जनता कर्फ्यू और नाइट कर्फ्यू से भी परिचय करवा दिया.

निश्चित रूप से ऐसे लोग भाग्यशाली ही कहे जायेंगे जिनका पाला अब तक कोरोना के वायरस से नहीं पड़ा और वे लॉक डाउन या कोरोना कर्फ्यू का पालन करते हुए मास्क लगाकर लोगों से उचित शारीरिक दूरी बनाये रखते हुए खुद को और साथ ही अपने परिवार को भी सुरक्षित रख पाए और कोरोना पॉजिटिव होने से बच गए. हालाँकि जो लोग कोरोना पॉजिटिव होने से खुद को बचा लिए उनको हर दिन चौबीसों घंटे इन शब्दों की गूंज ने मनोवैज्ञानिक दृष्टि से थका डाला. इस दौरान राहत की बात इतनी अवश्य रही कि ऐसे अनेकों नकारात्मक भाव वाले शब्दों के बीच में कुछ बेहद सकारात्मक भाव वाले शब्दों की गूंज भी होती रही और वे शब्द हैं योग, यज्ञ, आयुर्वेद, काढ़ा, इम्युनिटी और अणु तैल, श्वासारी वटी तथा कोरोनिल टेबलेट के साथ कोरोनिल किट.

लगभग एक वर्ष तक कोरोना महामारी से लड़ने और इससे उबरने की जद्दोजहद के बीच उम्मीद बंध रही थी कि वर्ष 2021 में परिस्थितियां शायद सामान्य हो जाएँ और निश्चित रूप से मार्च तक ऐसा लगने भी लगा था. जन-जीवन सामान्य होता प्रतीत हो रहा था और बेपटरी हो चुकी व्यवस्थाएं भी धीरे–धीरे वापस पटरी पर आती हुई लग रही थीं. पर निश्चित रूप से यह बड़े तूफ़ान के आने के पहले वाली शांति थी जिसको भागदौड़ वाली जिन्दगी और दूसरी जरूरतों के बीच कोई समझ नहीं सका या शायद जानबूझकर अनदेखा कर दिया गया. कुछ विशेषज्ञ भी धोखा खा गए और उन्होंने इसको हर्ड इम्युनिटी का नाम देते हुए कयास लगा लिया कि भारत हर्ड इम्युनिटी के करीब है.

दरअसल हर्ड इम्युनिटी तब विकसित होती है जब आबादी के बड़े हिस्से का टीकाकरण हो जाए अथवा वह हिस्सा संक्रमित हो जाए और उसमें बीमारी के खिलाफ एंटीबॉडी विकसित हो जाए. इस प्रकार कोई संक्रमित बेहद कम लोगों को संक्रमित कर पाता है और वायरस का प्रसार थम जाता है. पर निश्चित रूप से क्या ख़ास और क्या आम सभी गलत साबित हुए क्योंकि देखते देखते कोरोना की दूसरी लहर की आंधी ने देश को पहले से कहीं ज्यादा भयावह मोड़ पर ला खड़ा कर दिया और इसने अनेकों ख़ास और आम लोगों की जानें ले लीं.

विशेषज्ञों ने इस भयावहता के लिए कोरोना वायरस के नए स्ट्रेन या वेरिएंट्स को दोषी ठहराया और इस तरह से नए वर्ष ने कुछ और नए शब्दों से भी हमारा परिचय करवाना शुरू कर दिया जैसे कि स्ट्रेन, वेरिएंट, म्यूटेंट, हर्ड इम्युनिटी वगैरह वगैरह. इन शब्दों के साथ ऑक्सीमीटर, ऑक्सीजन सिलिंडर, रेमडेसिविर इंजेक्शन, विटामिन सी और जिंक आदि शब्द भी सबकी जुबान पर चढ़ गए. सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हर जगह अफरा तफरी का माहौल बन गया. शासन प्रशासन चिकित्सा और अन्य व्यवस्था को सुधारने में लग गए तो मौके का फायदा उठाने वाले भी सक्रिय हो गए. देखते ही देखते तमाम अस्पतालों के आईसीयू भर गए और जरुरी दवाएं बाजार से गायब हो गईं यहाँ तक कि विटामिन सी और जिंक के टेबलेट भी. एक तरफ यह स्थापित किया जाने लगा कि महामारी से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार ऑक्सीजन और रेमडेसिविर इंजेक्शन है तो वहीं ना तो ऑक्सीजन की किल्लत ख़त्म हो रही थी और ना ही इंजेक्शन की कालाबाजारी ही रुक सकी.

दरअसल रेमडेसिविर इंजेक्शन एक वायरस-रोधी दवा है जिसको लगभग वर्ष 2014 में मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम और इबोला वायरस बीमारियों के इलाज के लिए विकसित किया गया था. इस दवा के ज़रिए इंसानों की कोशिकाओं में मौजूद वायरस को ख़ुद को कॉपी करके अपनी संख्या बढ़ाने से रोका जाता है पर यह क्लिनिकल ट्रायल में कोरोना के इलाज में लाभदायक नहीं पायी गई और कुछ मामलों में तो लोगों ने इससे होने वाले दुष्प्रभाव की भी शिकायत की.

बहरहाल रेमडेसिविर जैसी दवाओं की आपूर्ति की चुनौती हो या ऑक्सीजन कंसंट्रेटर की उपलब्धता ये सारी चुनौतियाँ तो आने वाले दिनों में दूर हो ही जाएँगी परन्तु भारत जैसे गहन आबादी और विकासशील देश को लोगों के इलाज के लिए अपेक्षाकृत सस्ते और प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों पर गंभीरता से विचार करना होगा. निश्चित रूप से यहाँ मेरा इशारा हमारी वर्षों पुरानी चिकित्सा पद्धति यानि योग और आयुर्वेद की तरफ ही है जिसको पुनर्जीवित करने के पतंजलि योगपीठ ने दिन रात एक कर दिया और सफलता भी प्राप्त की. साथ ही यह इशारा आज आयुर्वेद के डिग्री प्राप्त चिकित्सकों के साथ ही गाँव के उन वैद्यों की तरफ भी है जो अपना झोला उठाये बड़ी लगन के साथ भारत के गांवों में पुश्तैनी रूप से अपनी सेवाएं देते रहे हैं। आज अगर वे नहीं होते तो शायद गांवों का जो हाल होता उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

पतंजलि योगपीठ ने स्वदेशी चिकित्सा का अभियान चलाकर अप्रत्यक्ष रूप से झोलाछाप कहकर तिरस्कृत की जाने वाली इस विद्या को सिर्फ जीवित ही नहीं रखा बल्कि उसे सम्मानजनक स्थिति में ला खड़ा किया. अनेकों अपमान और उपहास झेलते हुए भी योग, आयुर्वेद और भारतीय पारंपरिक चिकित्सा व्यवस्था की पुनर्स्थापना का पुनीत कार्य योग ऋषि स्वामी रामदेव जी एवं उनके सहयोगी तथा पतंजलि के सीईओ आचार्य बालकृष्ण जी की देखरेख में विगत लगभग तीन दशकों में हो चुका है और इसके साक्षी आज भारत समेत विश्व के करोड़ों लोग हैं.

आज विश्वव्यापी इतनी बड़ी महामारी जिसमें दुनिया भर के देश इसके कहर से तबाही झेल रहे हों, जिसमें एक से बढ़कर एक सुपर स्पेशलिटी वाले हॉस्पिटल, एलोपैथी विशेषज्ञ चिकित्सक और विज्ञानी सभी अपने प्रयासों में असफल हो रहे हों और फिर भी इतने सफल चिकित्सा पद्धति को दोयम दर्जे का अधिकार दिया जाए, क्या ये हम सबके लिए अफसोसजनक और खुद को हानि पहुँचाने वाला नहीं है. यह एक प्रश्न है जिसका जवाब हर किसी जिम्मेदार व्यक्ति को जरुर ढूँढना होगा।

भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में हर काम सिर्फ सरकारें और सरकारी तंत्र नहीं कर सकतीं, कुछ जिम्मेदारी तो हम सबको भी लेनी होगी. यह जानते हुए भी कि योग और आयुर्वेद से निन्यानबे प्रतिशत बिमारियों को ठीक किया जा सकता है और किसी ने योग और आयुर्वेद को नहीं अपनाया तो इसकी जिम्मेदारी सरकार या सरकारी तंत्र पर तो नहीं थोपी जा सकती. यह जानते हुए भी कि हर तरह की बिमारियों से जूझने के लिए योग और आयुर्वेद जैसे अचूक अस्त्र-शस्त्र हमारे पास हैं, यदि फिर भी कोई सिर्फ विरोध या आलस्य के कारण इनका उपयोग नहीं कर रहा तो दोषी कौन कहलायेगा. पूरे विश्व का एक बड़ा वर्ग आज योग की शरण में आ चुका है और इसका श्रेय देश के यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी के साथ साथ भारत के हर नागरिक को जाता है.

11 दिसंबर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाये जाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद से इन सात वर्षों में अपनी जबरदस्त उपयोगिता की बदौलत ज्यादातर लोगों के लिए योग महज शरीर को स्वस्थ रखने का जरिया नहीं बल्कि एक व्यापक इंडस्ट्री भी बन गया पर पतंजलि योगपीठ से जुड़े मेरे जैसे हर कार्यकर्ता लिए यह हमेशा से सेवा कार्य ही रहा. आज महामारी के इस दौर में योग को शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का सबसे कारगर तरीका माना जा रहा है.

भले ही दुनिया भर में कोरोना की कई वैक्सीन डेवलप हो चुकी हो पर फ़िलहाल का सत्य तो यही है कि यह वैक्सीन कोरोना वायरस बीमार होने, अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु से शायद बचा ले लेकिन इसके ट्रांसमिशन से रक्षा करने में यह अब तक सफल साबित नहीं है. इसलिए हमें यह दुनिया को दिखाना होगा कि योग सिर्फ हाथ पैर मोड़ने या सांस लेने और छोड़ने या फिर आँखें बंद करके ध्यान में बैठने का नाम नहीं है बल्कि यह एक औषधि है. इसके लिए देश के हर व्यक्ति तक यह सन्देश पहुँचाने की जिम्मेदारी हम सभी की है कि सुबह उठकर कम से कम एक घंटे का योगाभ्यास सभी करें।

ये बात और है कि आंधियां हमारे वश में नहीं मगर चिराग जलाना तो इख्तियार में है. बस इन्हीं शब्दों को ध्यान में रखकर यदि योग का अनुसरण शुरू कर दें तो निश्चित रूप से पूरा विश्व समुदाय इस बात का गवाह बनेगा कि कोविड-19 महामारी के ताबूत में अंतिम कील भारत के लोगों ने ही ठोंका और वह कील थी योग और आयुर्वेद की.

 

डिस्क्लेमर- उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, तथ्य या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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